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दादा सा रा प्यारा मारा बनडा दादा सा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा बाबो सा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा नथड़ी भी टूटी सारा मोतीडा बिखर ग्या राईभर बैठ पुवावे सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा आता जाता रिज्यो मारा बनडा ओई मिलण को मौको सा बीरो सा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा मामो सा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा नथड़ी भी टूटी सारा मोतीडा बिखर ग्या राईभर बैठ पुवावे सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा आता जाता रिज्यो मारा बनडा ओई मिलण को मौको सा फूफांसा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा जीजोसा रा प्यारा मारा बनडा नथ पर मोर नचावे सा नथड़ी भी टूटी सारा मोतीडा बिखर ग्या राईभर बैठ पुवावे सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा छगन बाग में मगन बगीचा दाख तले घर मांको सा आता जाता रिज्यो मारा बनडा ओई मिलण को मौको सा यह लोकगीत राजस्थानी विवाह परंपरा में परिवारिक स्नेह, शृंगार और प्रेमालाप के सुंदर भावों को व्यक्त करता है। गीत में दादा-सा, बाबो-सा, मामा-सा, फूफां-सा जैसे परिजनों के माध्यम से दूल्हे (बनड़ा) के प्रति आदर और लगाव दर्शाया गया है। “नथ पर मोर नचावे सा” जैसे अलंकार दूल्हे के शृंगार और उसकी शोभा को उजागर करते हैं, जबकि “छगन बाग में मगन बगीचा” पंक्तियाँ प्रेम, मिलन और लोक-सौंदर्य का प्रतीक हैं। मोती बिखरने और राईभर द्वारा पुवावण का उल्लेख गीत में हास्य, खेल और रसिकता बढ़ाता है। कुल मिलाकर यह गीत राजस्थानी संस्कृति, पारिवारिक एकता और लोक-शृंगार का जीवंत उत्सव है।