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रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड(दोहा:११४-१२०) скачать в хорошем качестве

रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड(दोहा:११४-१२०) 6 месяцев назад

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रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड(दोहा:११४-१२०)

रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड प्लेलिस्ट    • रामचरितमानस मूलपाठ:उत्तरकाण्ड   भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥ ११४(ख) ॥ जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥ सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥ सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥ सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥ एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥ कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥ सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥ ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना ॥ भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥ नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥ ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती ॥ दो. -पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥ न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥ ११५(क) ॥ सो. सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥ ११५(ख) ॥ इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥ मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥ माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥ पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी ॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया ॥ राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥ तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥ अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥ दो. यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥ ११६(क) ॥ औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥ ११६(ख) ॥ सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥ ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी ॥ सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई ॥ जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥ तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥ सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥ जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥ तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा ॥ परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बिहाई ॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै ॥ मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥ दो. जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥ ११७(क) ॥ तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥ ११७(ख) ॥ तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥ ११७(ग) ॥ सो. एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ॥ जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥ ११७(घ) ॥ सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥ प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥ तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥ छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई ॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥ रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥ कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥ होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥ जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥ इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी ॥ जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥ इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥ दो. तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥ ११८(क) ॥ कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥ ११८(ख) ॥ शेष यहाँ: https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherl...

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