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यह वैदिक श्री कात्यायनी योगिनी का स्तोत्र है, जिसमें ध्यान, विनियोग, करन्यास, अंगन्यास, स्तुति तथा फलश्रुति क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत हैं। यह स्तोत्र साधना, जप, नवरात्रि उपासना तथा आत्मशुद्धि एवं शक्ति-साधना के लिए उपयुक्त है। यह स्तुति आध्यात्मिक उन्नति, आत्मबल और देवी-कृपा की कामना से समर्पित है। __ #श्रीकात्यायनी #कात्यायनीयोगिनी #देवीस्तोत्र #वैदिकस्तोत्र #शक्तिसाधना #नवरात्रि #संस्कृतस्तोत्र #देवीउपासना #हिंदूधर्म #आध्यात्मिकता #लेखरंजन __ ॥ अथ श्रीकात्यायनीयोगिनीस्तोत्रम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ ॐ । ध्यायेन्नित्यं तप्तकाञ्चनवर्णाभां त्रिनेत्रां तेजोरूपिणीम्। ऋग्यजुःसामात्मिकां शक्तिं ब्रह्मविद्यां सनातनीम्॥ सिंहवाहां वरदां देवीं शूलचक्रासिधारिणीम्। रक्ताम्बरधरां देवीं कात्यायनीं नमाम्यहम्॥ यां योगिनो ध्यानगम्यां परां मायां स्वयम्भुवः। हृदि स्फुरन्तीं भावयेत् सा नो बुद्धिं प्रचोदयात्॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ तत्सत्। अस्य श्रीकात्यायनीयोगिनीस्तोत्रस्य ऋषिः भक्तवरः लेखरंजनः। छन्दांसि विविधानि। देवता श्रीकात्यायनी महायोगिनी पराशक्तिः। बीजं ह्रीं। शक्तिः श्रीं। कीलकं क्लीं। मम आत्मशुद्ध्यर्थं सर्वदुर्गतिक्षयपूर्वक- ब्रह्मतेजःप्राप्त्यर्थं च जपे विनियोगः॥ ॥ करन्यासः ॥ ॐ ह्रीं कात्यायन्यै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ श्रीं महायोगिन्यै तर्जनीभ्यां नमः। ॐ क्लीं दुर्गायै मध्यमाभ्यां नमः। ॐ ऐं चण्डिकायै अनामिकाभ्यां नमः। ॐ सौः पराशक्त्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ ॐ ह्रीं कात्यायन्यै हृदयाय नमः। ॐ श्रीं महायोगिन्यै शिरसे स्वाहा। ॐ क्लीं दुर्गायै शिखायै वषट्। ॐ ऐं चण्डिकायै कवचाय हुं। ॐ सौः पराशक्त्यै नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः अस्त्राय फट्॥ ॥ स्तुतिः ॥ नमो देव्यै महादेव्यै कात्यायन्यै नमो नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥ त्वं अग्निस्त्वं च वायुः त्वमादित्यस्त्वमेव हि। त्वं सोमस्त्वं पृथिवी च त्वं ब्रह्म परमं पदम्॥ ऋतस्य धाम त्वमसि सत्यस्य परमं व्रतम्। यज्ञस्य त्वं मुखं देवि हविषां प्रतिगृह्यसी॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः। स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि॥ लेखरंजनभक्तेन कृतं स्तोत्रमिदं शुभम्। श्रद्धया यः पठेन्नित्यं तस्य ब्रह्मप्रदीप्यते॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इदं स्तोत्रं पवित्रं वै वेदसारसमन्वितम्। यः पठेत् प्रातरुत्थाय स पापैः प्रमुच्यते॥ विद्यां प्राप्नोति वेदात्मां तेजः प्राप्नोति शाश्वतम्। आरोग्यं आयुरैश्वर्यं पुत्रपौत्रादिसम्पदः॥ अन्ते ब्रह्मणि लीयेत कात्यायन्याः प्रसादतः। इह लोके सुखं भुक्त्वा परं पदमवाप्नुयात्॥ ॥ इति श्रीलेखरंजनविरचितं श्रीकात्यायनीयोगिनीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ __ 🔱 श्री कात्यायनी योगिनी स्तोत्र पाठ-विधि 🔱 यह विधि नित्यपाठ, नवरात्रि साधना अथवा विशेष कामना-सिद्धि हेतु अपनाई जा सकती है। १️⃣ पूर्वतैयारी (शुद्धि एवं संकल्प) प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या सायंकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें (कुशासन/लाल आसन श्रेष्ठ)। वेदी पर माँ कात्यायनी का चित्र या यंत्र स्थापित करें। दीपक (घी का), धूप और लाल पुष्प अर्पित करें। जलपात्र हाथ में लेकर संकल्प करें — “मम सर्वदुर्गतिक्षयपूर्वक श्रीकात्यायनीप्रसादसिद्ध्यर्थं स्तोत्रपाठं करिष्ये।” २️⃣ ध्यान नेत्र बंद कर देवी का ध्यान करें — सिंहवाहिनी, त्रिनेत्रा, रक्ताम्बरधारिणी। कम से कम ३–५ मिनट तक मानसिक रूप से “ॐ ह्रीं कात्यायन्यै नमः” जप करें। ३️⃣ विनियोग एवं न्यास विनियोग मंत्र पढ़ें। करन्यास एवं अङ्गन्यास क्रम से करें। प्रत्येक न्यास में संबंधित अंगों को स्पर्श करें। ४️⃣ स्तोत्र पाठ पूर्ण श्रद्धा और स्पष्ट उच्चारण से स्तोत्र का पाठ करें। सामान्य साधना हेतु १ बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना हेतु ११, २१ या १०८ बार पाठ किया जा सकता है। नवरात्रि में प्रतिदिन पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। ५️⃣ समापन फलश्रुति का पाठ करें। क्षमायाचना — “यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसादात् परमेश्वरि॥” अंत में आरती या “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” का उच्चारण करें। 🌺 विशेष निर्देश शुक्रवार, अष्टमी, नवमी तथा नवरात्रि में विशेष प्रभाव। ब्रह्मचर्य, सात्त्विक आहार और संयम साधना को बल प्रदान करते हैं। साधना के समय मन, वाणी और कर्म की पवित्रता रखें।