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अहंकार पिघला — हरि मिल गया “नि… रे… सा… रे… नि… प… सा…” “हरि… ओम्… शांति… आनंदम्…” “अद्वैतं… निःशेषं… सर्वं हरि…” “रे नि प, सा रे नि… प म प सा…” सब तू ही — मैं नहीं कुछ भी, मन में न कोई भेद ॥ एक तू ही हरि सर्वात्मा, तुझमें ही सब खेल ॥ जहाँ न “मैं–तू”, न “मेरा–तेरा”, वहाँ बस हरि का प्रकाश, जिसे भी देखूँ, हरि ही दिखें, सबमें वही निवास ॥ अग्नि में गिरे जो भी वस्तु, अग्नि ही हो जाए स्वरूप, वैसे ही हर जीव में हरि, और हरि में जीव का रूप ॥ “हरि… हरि… ओम् हरि… अद्वैतम्…” सब तू ही — मैं नहीं कुछ भी, मन में न कोई भेद ॥ एक तू ही हरि सर्वात्मा, तुझमें ही सब खेल ॥ जिसमें न “देना–लेना” का भाव, न मन में कोई द्वेष, बाएँ हाथ से दाएँ हाथ को वस्तु दे जैसे सहज परिवेश ॥ न अपना–पराया कुछ दिखे, न भीतर कोई विकल्प, जहाँ जहाँ दृष्टि टिके हरि, वहीँ हरि का ही संकल्प ॥ “हरिः सर्वम्… सर्वं हरिः… शांति… शांति…” सब तू ही — मैं नहीं कुछ भी, मन में न कोई भेद ॥ एक तू ही हरि सर्वात्मा, तुझमें ही सब खेल ॥ भक्त जहाँ जाए, हरि वहाँ, हरि की धड़कन साथ, एकत्व की इस गहराई में मिट जाता जन्म-प्रसाध ॥ सब रूपों में हरि ही हरि, न भेद का कोई चिन्ह, निरपेक्ष प्रेम का यह सरोवर, सहज अनंत, अतिशांत ॥ “ओम् हरि… हरि ओम्… आनंदं… अद्वैतम्…” सब तू ही — मैं नहीं कुछ भी, मन में न कोई भेद ॥ एक तू ही हरि सर्वात्मा, तुझमें ही सब खेल ॥ अब भक्त न रहे, न हरि रहे, बस नाद अनंत बहे, भक्ति ब्रह्म में विलीन हुई, और प्रेम स्वयं कहे ॥ देव और भक्त, एक हो गए, अंतर मिटा अनंत, “अद्वैत भक्ति” गूँजे मन में, बन गई ब्रह्म की छंद ॥ “हरि… हरि… ओम्… शांति… सा रे नि… प म प…” “अनंतम्… अनंतम्… अद्वैतम्…” Note: This devotional content was created with the support of AI tools under human guidance. It is intended solely for spiritual and creative expression. Copyrights © 2025 Learn Advaita Vedanta.