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यहूदी परिवारों के मालिकाना हक वाली कलाकृतियों की नाजी शासनकाल में सुनियोजित लूट के मामलों की कभी अच्छी तरह पड़ताल नहीं हुई. जिन परिवारों को नाजी जर्मनी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था, उनकी पीढ़ियां अब भी अपनी संपत्ति की तलाश कर रही हैं. अक्सर निराशा ही उनके हाथ लगती है. यह डॉक्युमेंट्री बड़े पैमाने पर हुई नाजी लूटपाट के सुराग तलाशती है. कलाकृतियों के उद्गम की जांच करने वाली रिसर्चर कातरिन क्लाइबेल और उनके सहकर्मी इस अपराध की जांच कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि एक रोज इंसाफ मिलेगा. कातरिन का काम है, लूटी गई कलाकृतियों का पता लगाकर उन्हें उनके सही मालिकों तक पहुंचाना. जिन यहूदी परिवारों को जर्मनी छोड़ने का हुक्म मिला, उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि वो अपनी संपत्ति साथ ले जा सकते हैं. लेकिन ज्यादातर मामलों में उनका सामान पीछे छूट गया. हैम्बर्ग बंदरगाह जैसी जगहों में रखे हजारों संदूक नाजी पुलिस गेस्टापो ने जब्त कर लिए. सामान को उनके मालिकों के पास भेजने की जगह नीलाम कर दिया गया. घरों का समूचा सामान, हैम्बर्ग बेलिफ ऑफिस समेत कई और नीलामी घरों ने बोली लगाकर बेच दिया गया. इनमें कई कीमती कलाकृतियां भी थीं. खुलेआम अखबारों में इन नीलामियों के विज्ञापन छपे. हैम्बर्ग में इन नीलामियों से नाजियों के लिए करीब 72 लाख राइषमार्क की रकम जुटाई गई. इतिहासकार फ्रांक बायोर इसे सरकार द्वारा प्रायोजित खरीद-फरोख्त कहते हैं. आम लोगों, संग्रहालयों और डीलरों के हाथों में पड़कर ये चीजें लापता हो गईं. ज्यादातर मामलों में वो चीजें फिर कभी नजर नहीं आईं. उन नीलाम की गई चीजों के मालिक कौन थे और कौन थे खरीदार? कातरिन क्लाइबेल अपने मिशन के बारे में यूं बताती हैं, "हमारा मुख्य मकसद ये सामान उन परिवारों को वापस लौटाना है." जर्मन लॉस्ट आर्ट फाउंडेशन द्वारा फंड किए जा रहे इस शोध अभियान में क्लाइबेल तेजी से काम कर रही हैं. शोध में जिस एक बात से उन्हें काफी मदद मिली, वो ये है कि नाजियों ने अपने अपराधों का काफी विस्तृत ब्योरा दर्ज किया था. कातरिन क्लाइबेल के पास नीलामी रिपोर्ट, दुकानों के बही-खाते और बिल जैसे हजारों पन्नों के दस्तावेज हैं. यह काम बेहद मुश्किल है, लेकिन क्लाइबेल बताती हैं, "पहेली के इन बिखरे हुए टुकड़ों की मदद से, हम चोरी की शुरुआती जगह से हैम्बर्ग में हुई बिक्री तक के समूचे सफर की निशानदेही कर सकते हैं." इन यहूदी परिवारों के वंशज अब अपना खोया हुआ सामान वापस पाने की थोड़ी उम्मीद रख सकते हैं. जैसे कि वीसबाडन का कॉख परिवार, जिन्हें लंदन चले जाने के लिए मजबूर किया गया था. लेकिन उनके बक्से, जिनमें नोल्डे, यावलेंस्की और क्ले की कलाकृतियों समेत बेशकीमती कला संग्रह बंद था, कभी नहीं मिला. उनके दादा-दादी की संपत्ति का क्या हुआ? एक पेंटिंग से जुड़ा अहम सुराग मिला है, लेकिन कई बार हुई खरीद-बिक्री और बहुत हद तक रहस्य में रहने वाले कला बाजार के कारण यह खोज मुश्किल साबित हो रही है. जैसा कि कॉख परिवार के एक सदस्य का कहना है, "अगर हमारी पीढ़ी यह तलाश बंद कर देगी, तो यह अध्याय हमेशा के लिए अंधेरे में कहीं खो जाएगा." बर्लिन की योहाना प्लोचित्स्की का बेशकीमती कला संग्रह भी खो गया. उनके संग्रह में कुल 1,500 चीजें थीं. इसमें पीसारो, बेकमन और लिबरमान जैसे मशहूर कलाकारों का काम शामिल था. ये सब हैम्बर्ग में तीन दिनों तक चली एक नीलामी में बेच दिया गया. आज तक उनके वारिस उम्मीद कर रहे हैं कि कम-से-कम कुछ चीजें तो वापस मिल जाएं. जर्मन इतिहास का यह अध्याय, हैम्बर्ग कुंस्टहाले कला संग्रहालय की प्रोवेनेंस रिसर्चर डॉ. ऊटे हाउग के लिए भी एक चुनौती बना हुआ है. 1941 में इस संग्रहालय ने एक नीलामी में आठ पेंटिंग्स खरीदीं. लेकिन क्या इन कलाकृतियों को सही तरीके से उन परिवारों को सौंपा जा सकेगा, जिनसे इन्हें चुराया गया था? ऊटे हाउग अपनी इस कोशिश में कातरिन क्लाइबेल की भी मदद ले रही हैं. #DWDocumentaryहिन्दी #DWहिन्दी #lootedart #nazigermany #forgottenhistory ---------------------------------------------- अगर आपको वीडियो पसंद आया और आगे भी ऐसी दिलचस्प वीडियो देखना चाहते हैं तो हमें सब्सक्राइब करना मत भूलिए. विज्ञान, तकनीक, सेहत और पर्यावरण से जुड़े वीडियो देखने के लिए हमारे चैनल DW हिन्दी को फॉलो करे: @dwhindi और डॉयचे वेले की सोशल मीडिया नेटिकेट नीतियों को यहां पढ़ें: https://p.dw.com/p/MF1G