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महाभारतोक्त-रुद्राभिषेकस्तोत्रम् +2 महाभारतोक्त-रुद्राभिषेकस्तोत्रम् (द्रोणपर्व, अध्याय 80) महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन और कृष्ण द्वारा पाशुपतास्त्र की प्राप्ति हेतु भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गाया गया एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह 10-12 श्लोकों का स्तोत्र भवरोग नाशक, विजय प्रदायक और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है, जिसमें शिव के रुद्र रूप की स्तुति की गई है Doshi Dhrumit। महाभारतोक्त-रुद्राभिषेकस्तोत्रम् (संस्कृत एवं हिन्दी अर्थ) ॐ नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च। पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने॥1॥ अर्थ: (भव, शर्व, रुद्र, वरदाता, पशुपति, उग्र और कपर्दी - इन रूपों में भगवान शिव को नमस्कार)। महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये। ईशानाय मखघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने॥2॥ अर्थ: महादेव, भीम, त्र्यम्बक, शांत, ईशान, यज्ञनाशक और अंधकासुर के विनाशक शिव को नमस्कार। कुमारगुरवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे। पिनाकिने हविष्याय सत्याय विभवे सदा॥3॥ अर्थ: कार्तिकेय के गुरु, नीलकंठ, विधाता, पिनाक धारी, हविष्य (यज्ञ) ग्रहण करने वाले, सत्य और विभु को नमस्कार Doshi Dhrumit। विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते। नित्यनीलिशखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे॥4॥ अर्थ: विशेष लोहित (लाल) और धूम्रवर्ण वाले, मृगव्याध, अपराजेय, नित्य नीलशिखंड (नीले केश) धारण करने वाले, शूलधारी और दिव्य दृष्टि वाले को नमस्कार। हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे। अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुतायच॥5॥ अर्थ: संहारक, रक्षक, त्रिनेत्र, व्याध, वसुरेतस (अग्नि), अचिंत्य, अंबिकापति और सभी देवताओं द्वारा स्तुति किए गए शिव को नमस्कार। वृषध्वजाय मुण्डाय जिटने ब्रह्मचारिणे। तप्यमानाय सिलले ब्रह्मण्यायाजिताय च॥6॥ अर्थ: वृषभध्वज, मुंड (जटाधारी), जिट (जीतने वाले), ब्रह्मचारी, जल में तपस्या करने वाले और ब्राह्मणभक्त को नमस्कार। विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते। नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा॥7॥ अर्थ: विश्वात्मा, विश्वस्रष्टा, विश्व को व्याप्त करने वाले, सेव्य और सभी भूतों के प्रभु को नमस्कार। ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शंकराय शिवाय च। नमोऽस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नम:॥8॥ अर्थ: ब्राह्मण (ब्रह्मा) जिनका मुख है, सर्व, शंकर, शिव, वाच स्पति और प्रजापति को नमस्कार।