У нас вы можете посмотреть бесплатно Shree Harsu Brahm Chalisa | श्री हरसु ब्रह्म चालीसा | Sukanya Surabhi | Shri Harsu Brahma Chalisa или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
श्री हरसु ब्रह्म चालीसा | Sukanya Surabhi | Shree Harsu Brahma Chalisa | Shri Harsu Brahm Chalisa ► Album :- Shri Harsu Brahm Chalisa ► Song :- श्री हरसु ब्रह्म चालीसा ► Singer :- Sukanya Surabhi ► Lyrics :- Lt. Lal Ji Tripathi ► Music :- Santosh Kumar ► Producer :- Chandrashekhar Pandey ► Lable - Guru Kripa Entertainment .........Warning............ हमारे Channel के गाने का DJ Remix बनाना एवं इसके Video को YouTube में Re-upload करना और Local TV Channel में बिना अनुमति के ब्रॉडकास्ट करना गैरकानूनी है। अतः आप से अनुरोध है की ऐसा न करे वरना आप के ऊपर क़ानूनी करवाई की जाएगी। ------------------------- श्री हरसु ब्रह्म चालीसा ----------------------- बाबा हरसू ब्रह्म के चरणों का करि ध्यान। चालीसा प्रस्तुत करूं पावन यश गुण गान॥ ** हरसू ब्रह्म रूप अवतारी। जेहि पूजत नित नर अरु नारी॥१॥ ** शिव अनवद्य अनामय रूपा। जन मंगल हित शिला स्वरूपा॥ २॥ ** विश्व कष्ट तम नाशक जोई। ब्रह्म धाम मंह राजत सोई ॥३॥ ** निर्गुण निराकार जग व्यापी। प्रकट भये बन ब्रह्म प्रतापी॥४॥ ** अनुभव गम्य प्रकाश स्वरूपा। सोइ शिव प्रकट ब्रह्म के रूपा॥५॥ ** जगत प्राण जग जीवन दाता। हरसू ब्रह्म हुए विखयाता॥६॥ ** पालन हरण सृजन कर जोई। ब्रह्म रूप धरि प्रकटेउ सोई॥७॥ ** मन बच अगम अगोचर स्वामी। हरसू ब्रह्म सोई अन्तर्यामी॥८॥ ** भव जन्मा त्यागा सब भव रस। शित निर्लेप अमान एक रस॥९॥ ** चैनपुर सुखधाम मनोहर। जहां विराजत ब्रह्म निरन्तर॥१०॥ ** ब्रह्म तेज वर्धित तव क्षण-क्षण। प्रमुदित होत निरन्तर जन-मन॥११॥ ** द्विज द्रोही नृप को तुम नासा। आज मिटावत जन-मन त्रासा॥१२॥ ** दे संतान सृजन तुम करते। कष्ट मिटाकर जन-भय हरते॥१३॥ ** सब भक्तन के पालक तुम हो। दनुज वृत्ति कुल घालक तुम हो॥१४॥ ** कुष्ट रोग से पीड़ित होई। आवे सभय शरण तकि सोई॥१५॥ ** भक्षण करे भभूत तुम्हारा। चरण गहे नित बारहिं बारा॥१६॥ परम रूप सुन्दर सोई पावै। जीवन भर तव यश नित गावै॥१७॥ ** पागल बन विचार जो खोवै। देखत कबहुं हंसे फिर रोवै॥१८॥ ** तुम्हरे निकट आव जब सोई। भूत पिशाच ग्रस्त उर होई॥१९॥ ** तुम्हरे धाम आई सुख माने। करत विनय तुमको पहिचाने॥२०॥ ** तव दुर्धष तेज के आगे। भूत-पिशाच विकल होई भागे॥२१॥ ** नाम जपत तव ध्यान लगावत। भूत पिशाच निकट नहिं आवत॥२२॥ ** भांति-भांति के कष्ट अपारा। करि उपचार मनुज जब हारा॥२३॥ ** हरसू ब्रह्म के धाम पधारे। श्रमित-भ्रमित जन मन से हारे॥२४॥ ** तव चरणन परि पूजा करई। नियत काल तक व्रत अनुसरई॥२५॥ श्रद्धा अरू विश्वास बटोरी। बांधे तुमहि प्रेम की डोरी॥२६॥ ** कृपा करहुं तेहि पर करुणाकर। कष्ट मिटे लौटे प्रमुदित घर॥२७॥ ** वर्ष-वर्ष तव दर्शन करहीं। भक्ति भाव श्रद्धा उर भरहीं॥२८॥ ** तुम व्यापक सबके उर अंतर। जानहुं भाव कुभाव निरन्तर॥२९॥ ** मिटे कष्ट नर अति सुख पावे। जब तुमको उन मध्य बिठावे॥३०॥ ** करत ध्यान अभ्यास निरन्तर। तब होइहहिं प्रकाश उर अंतर॥३१॥ ** देखिहहिं शुद्ध स्वरूप तुम्हारा। अनुभव गम्य विवेक सहारा॥३२॥ ** सदा एक-रस जीवन भोगी। ब्रह्म रूप तब होइहहिं योगी॥३३॥ ** यज्ञ-स्थल तव धाम शुभ्रतर। हवन-यज्ञ जहं होत निरंतर॥३४॥ ** सिद्धासन बैठे योगी जन। ध्यान मग्न अविचल अन्तर्मन॥३५॥ ** अनुभव करहिं प्रकाश तुम्हारा। होकर द्वैत भाव से न्यारा॥३६॥ ** पाठ करत बहुधा सकाम नर। पूर्ण होत अभिलाष शीघ्रतर॥३७॥ ** नर-नारी गण युग कर जोरे। विनवत चरण परत प्रभु तोरे॥३८॥ ** भूत पिशाच प्रकट होई बोले। गुप्त रहस्य शीघ्र ही खोले॥३९॥ ** ब्रह्म तेज तव सहा न जाई। छोड़ देह तब चले पराई॥४०॥ ** पूर्ण काम हरसू सदा, पूरण कर सब काम। परम तेज मय बसहुं तुम, भक्तन के उर धाम॥