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00:00 - 10:00 मिनट: मंगलाचरण और लेखक परिचय • मंगलाचरण: सत्र की शुरुआत मंगलाचरण और श्री वल्लभाचार्य/गुरु वंदना से होती है। • लेखक परिचय: ग्रंथ 'वेदांत चिंतामणि' के लेखक श्री गट्टू लाला जी (श्री गोवर्धन शर्मा) का परिचय। उन्हें 'भारत मार्तंड' (विद्वानों में सूर्य समान) की उपाधि प्राप्त थी। • विद्वता: बाल्यकाल में नेत्र ज्योति खोने के बावजूद, उन्होंने श्रुत विधि (सुनकर) से अगाध पांडित्य प्राप्त किया। वे 'शतावधानी' थे और कई भाषाओं, संगीत और कला में निपुण थे। 10:00 - 20:00 मिनट: ग्रंथ का महत्व और प्रकरण ग्रंथों की आवश्यकता • ग्रंथ की स्थिति: वक्ता बताते हैं कि इस दुर्लभ ग्रंथ का पठन-पाठन संप्रदाय में बहुत कम हुआ है। • प्रकरण ग्रंथ की कमी: अन्य दर्शनों (न्याय, सांख्य) में सरल प्रवेशिका (प्रकरण ग्रंथ) उपलब्ध हैं, लेकिन शुद्धाद्वैत में इसकी कमी थी। 'प्रमेय रत्न' (लालु भट्ट जी) एक ग्रंथ है, लेकिन वह विशिष्ट अधिकारी के लिए था। • वेदांत चिंतामणि का उद्देश्य: यह ग्रंथ सामान्य जिज्ञासुओं के लिए पदार्थों और सिद्धांतों को समझाने वाला एक उत्कृष्ट प्रकरण ग्रंथ है। 20:00 - 30:00 मिनट: प्रथम प्रकरण का सिंहावलोकन (Overview) - जिज्ञासा • अध्याय परिचय: प्रथम प्रकरण का नाम 'नास्तिक्योच्छेद' है। • सृष्टि की विचित्रता: मंगलाचरण (श्लोक 1-3) के बाद उपक्रम (श्लोक 4 से) में प्रश्न उठता है—यह विचित्र और विविधतापूर्ण जगत किसने बनाया? • जिज्ञासा: क्या यह जगत केवल पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, आदि) से अपने आप बना है, या इसके पीछे कोई कर्ता है? 30:00 - 40:00 मिनट: नास्तिक/चारवाक मत और तर्क दोष • नास्तिक तर्क: चारवाक मत का कहना है कि हवा, पानी के बहाव से आकृतियाँ अपने आप बन जाती हैं, वैसे ही जगत भी 'स्वभाव' से बना है। • तर्क दोष: वक्ता समझाते हैं कि केवल तर्क से सृष्टि की व्याख्या करने में 'अनवस्था दोष' (Infinite Regress) और 'चक्रक दोष' आते हैं। "क्यों?" और "कैसे?" का अंतहीन सिलसिला चलता रहता है। 40:00 - 50:00 मिनट: प्रमाण और सत्यापन (Verification) • प्रमाण की आवश्यकता: जैसे कोर्ट में गवाह की 'आप्तता' (विश्वसनीयता) जांची जाती है, वैसे ही शास्त्रों और तर्कों की भी जांच होनी चाहिए। • पाश्चात्य दर्शन: 'लॉजिकल पॉजिटिविज्म' और सत्यापन के सिद्धांत की चर्चा—जो वेरीफाई नहीं हो सकता, उसे सत्य कैसे मानें? • चेतन की आवश्यकता: जड़ पदार्थों में स्वयं प्रवृत्ति नहीं हो सकती, इसलिए एक 'चेतन' (ईश्वर) को मानना आवश्यक हो जाता है। 50:00 - 01:00:00 मिनट: ईश्वर: सृष्टा, प्रवर्तक और नियंता • मकड़ी का उदाहरण (श्लोक 13): जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाला निकालती है और उसी में खेलती है, वैसे ही ब्रह्म अपने उपादान (Material) से सृष्टि रचते हैं। • केवल सृष्टा नहीं: ईश्वर केवल बनाकर छोड़ देने वाला (Deist God) नहीं है, बल्कि वह प्रवर्तक (धक्का देने वाला) और नियंता (कंट्रोलर) भी है। • उदाहरण: इसरो (ISRO) के सैटेलाइट का उदाहरण—छोड़ने के बाद भी नियंत्रण जरूरी है। 01:00:00 - 01:10:00 मिनट: ईश्वर का दर्शन क्यों नहीं होता? • मीमांसक मत खंडन: मीमांसक केवल 'कर्म' को मानते हैं, ईश्वर को नहीं। इसका खंडन किया गया। • परोक्षता का कारण: यदि ईश्वर है, तो राजा की तरह दिखाई क्यों नहीं देता? उत्तर: तिरोभाव (पर्दा/माया) के कारण। • साक्षात्कार: ज्ञान और भक्ति द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। 01:10:00 - 01:20:00 मिनट: जीव, कर्म चक्र और लीला दृष्टि • कर्म प्रवाह (श्लोक 32-36): जीवों के संस्कार, कर्म, और पुनर्जन्म का चक्र। नदी के प्रवाह की तरह यह अबाधित चलता रहता है। • दृष्टि भेद: मर्यादा मार्गी इसे 'बंधन' और 'दुःख' मानता है, जबकि पुष्टि मार्गी इसे 'जगदीश की लीला' (श्लोक 41) मानता है। दृष्टि बदलने से भय समाप्त हो जाता है। 01:20:00 - 01:30:00 मिनट: जगत भगवान की क्रीड़ा (Play) • शतरंज और पुतले: भगवान इस जगत को शतरंज की बिसात की तरह अपनी इच्छा (स्वेच्छा) से चलाते हैं। वे ही हार-जीत और सुख-दुःख तय करते हैं। • इच्छा मात्र से सृष्टि: भगवान को किसी बाहरी साधन की जरूरत नहीं, वे अपनी 'अचिंत्य सामर्थ्य' (श्लोक 46) से सृष्टि करते हैं। 01:30:00 - 01:40:00 मिनट: वेद और शास्त्र का महत्व • वेद का प्रयोजन: सृष्टि रचने के बाद भगवान ने जीवों के कल्याण के लिए वेद प्रकट किए। • अधिकार: सकाम जीव देवताओं को भजते हैं, निष्काम भक्त भगवान को। • कर्तव्य: भगवान की करुणा को देखकर उनकी सेवा करना ही जीव का कर्तव्य है। 01:40:00 - 01:50:00 मिनट: गुरु और परंपरा (Tradition) • परंपरा का महत्व: केवल किताबी ज्ञान (University degree) काफी नहीं है। "परंपरा प्राप्त विद" (श्लोक 57) गुरु से ही ज्ञान लेना चाहिए। • उदाहरण: सोमपुरा (मंदिर वास्तुकार) और किसान के बेटे का उदाहरण—जो ज्ञान वंश/परंपरा से आता है, वह केवल डिग्री से नहीं आता। 01:50:00 - 02:00:00 मिनट: सेवा प्रकार और बाह्य चिह्न • मूर्ति पूजा: जब तक साक्षात दर्शन न हो, मूर्ति (प्रतिमा) में भगवान का अर्चन करना चाहिए। • वैष्णव चिह्न: कंठी, तिलक और मुद्रा धारण करना भगवान के 'सेवक' की पहचान (Uniform) है। इनके बिना मंदिर जाना अनुचित है। • निष्कर्ष (श्लोक 68): निरंतर वेदाभ्यास से यह बुद्धि स्थिर करनी चाहिए कि 'परब्रह्म श्री कृष्ण ही सबके आदि हैं' और उनकी सेवा करनी चाहिए। 02:00:00 - अंत तक: प्रश्नोत्तरी (Q&A) • प्रश्न: क्या वेद के अलावा अन्य साधन (जैसे केवल पुष्टि) नहीं हैं? • उत्तर: यह ग्रंथ वेदांतियों और सामान्य आस्तिकों के लिए है, इसलिए वेद पर जोर दिया गया है। पुष्टि मार्ग में 'अनुग्रह' स्वतंत्र