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यहाँ इस वीडियो का विस्तृत सारांश और मुख्य बिंदु दिए गए हैं: वीडियो सारांश (Video Summary) 1. प्रश्न-उत्तर: वैष्णव मत और अन्य संप्रदाय (00:00 - 08:00) • जिज्ञासा: एक श्रोता ने प्रश्न किया कि प्रथम प्रकरण में केवल वैष्णव मत की ही बात क्यों की गई है? शैव या शाक्त मत का खंडन या मंडन क्यों नहीं है? • समाधान: वक्ता ने स्पष्ट किया कि: • शास्त्रों का मूल सिद्धांत यही है कि "परब्रह्म तो श्री कृष्ण ही हैं" (परं ब्रह्म तु कृष्णो हि). • अन्य देवताओं (शिव, शक्ति आदि) की उपासना सकाम (कामना सहित) मानी जाती है। • यदि कोई अन्य देव को 'परब्रह्म' मानकर भजता है, तो वह 'सिद्धांत' नहीं, बल्कि उसकी 'भूल' है। • वैष्णव मत ही मूल वेदांत का प्रतिपाद्य विषय है, इसलिए यहाँ उसी को मुख्य रखा गया है। 2. द्वितीय प्रकरण का परिचय और पारायण का प्रस्ताव (08:00 - 10:30) • अध्याय का नाम: 'प्रमाण निरूपणम्' (द्वितीय प्रकरण)। • अध्ययन शैली: वक्ता ने सुझाव दिया कि व्याख्या शुरू करने से पहले पूरे अध्याय का हिंदी अनुवाद एक बार पढ़ (पारायण कर) लेना चाहिए। • लाभ: इससे श्रोताओं को पूरे विषय का 'ओवरव्यू' (Overview) मिल जाता है और अनावश्यक प्रश्न नहीं उठते, क्योंकि कई बार आगे के श्लोकों में ही उत्तर छिपे होते हैं। 3. द्वितीय प्रकरण का 'पारायण' (Text Reading) (10:30 - 25:00) वक्ता ने ग्रंथ के हिंदी अनुवाद का पाठ किया, जिसमें निम्नलिखित मुख्य सिद्धांत शामिल थे: • ब्रह्म और प्रमाण: ब्रह्म 'परोक्ष' (इंद्रियों से परे) है, इसलिए उसे जानने के लिए केवल 'शब्द' (वेद) ही एकमात्र प्रमाण है। • प्रमाण चतुष्टय (Four Proofs): श्री वल्लभाचार्य जी के अनुसार चार मुख्य प्रमाण हैं: 1. वेद (श्रुति) 2. गीता (स्मृति) 3. ब्रह्मसूत्र (व्यास जी के सूत्र) 4. भागवत (समाधि भाषा) • संदेह निवारण: पूर्व के ग्रंथों में जहाँ संदेह हो, वहाँ उत्तरवर्ती ग्रंथ (जैसे वेद का संदेह गीता से, गीता का सूत्रों से, और सबका भागवत से) निर्णय करते हैं। • वेद की दिव्यता: वेद साक्षात नारायण स्वरूप हैं। • भागवत महात्म्य: व्यास जी को जब असंतोष हुआ, तब समाधि में उन्होंने जो देखा, वही भागवत है। यह वेदों का फल है। • जीव का कर्तव्य: जीव भगवान का दास है। जो भगवान का आश्रय नहीं लेता, वह 'चोर' और 'आत्मघाती' है। 4. सत्र का समापन और निष्कर्ष (25:00 - अंत तक) • सारांश: वक्ता ने पढ़ाए गए पाठ का सार बताया कि इस अध्याय में मुख्य रूप से वेद का अपौरुषेयत्व (ईश्वरीय होना) और प्रमाण व्यवस्था (प्रमाण चतुष्टय) समझाई जाएगी। • विश्राम: इसके बाद सत्र को विराम दिया गया ताकि अगले भाग (Part 3) में एक-एक श्लोक की विस्तृत व्याख्या की जा सके।