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📌 वीडियो अध्याय और सारांश (Chapters & Summary) 00:00 - 00:15 | प्रकरण की संगति और अनुबंध चतुष्टय प्रकरण संगति: प्रथम प्रकरण (नास्तिक्योच्छेद) और द्वितीय प्रकरण (प्रमाण निरूपण) के बीच क्या संबंध है? एक प्रश्न का उत्तर कि प्रथम प्रकरण नास्तिक मतों का फिल्टर है और द्वितीय प्रकरण आस्तिक/वैदिक प्रमाणों की स्थापना है। अनुबंध चतुष्टय: किसी भी ग्रंथ के चार अनुबंध—अधिकारी, विषय, संबंध और प्रयोजन का विवेचन। ऐतिहासिक संदर्भ: गट्टू लाला जी के समय (अंग्रेजों का काल) में पाश्चात्य शिक्षा और भौतिकवाद के प्रभाव के कारण इस ग्रंथ की आवश्यकता क्यों पड़ी। 00:15 - 00:30 | अधिकारी विचार और आधुनिक चुनौतियां ग्रंथ का अधिकारी कौन?: क्या यह केवल पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के लिए है या सभी आस्तिकों के लिए? जो परंपरा से वैष्णव हैं पर जिनमें संशय है, या जो पाश्चात्य प्रभाव से डांवाडोल हैं, उनके लिए यह ग्रंथ है। सांस्कृतिक परिवर्तन: पुराने समय में शिखा-सूत्र और वेशभूषा के प्रति निष्ठा और आधुनिक 'सेक्युलर' समय में श्रद्धा की चुनौती। जिज्ञासा का महत्व: जिज्ञासा ही अधिकारिता का मूल लक्षण है। 00:30 - 00:45 | प्रमाण विचार और प्रत्यक्ष की सीमा पूर्व प्रकरण का सार: प्रथम प्रकरण के अंत में (कारिका 68) "वेदाभ्यास" पर जोर दिया गया, जिससे द्वितीय प्रकरण (प्रमाण विचार) की नींव पड़ती है। प्रमाण क्या है?: "प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्" - ज्ञान के साधन को प्रमाण कहते हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण: इंद्रियों की सीमा। क्या जो दिखता नहीं, वह होता नहीं? हाथियों का दृष्टांत: हाथियों की अतींद्रिय संवेदना (Telepathy/Intuition) और संवेदना का विज्ञान से परे होना। 00:45 - 01:00 | अनुमान, उपमान और अन्य प्रमाण अनुमान प्रमाण: "धुआं देखकर आग का ज्ञान"—हेतु और साध्य का संबंध। अनुमान की सीमाएँ (जहाँ साध्य प्रत्यक्ष हो, वहाँ अनुमान की जरूरत नहीं)। अन्य प्रमाण: उपमान (सादृश्य), अनुपलब्धि (किसी वस्तु के न होने से ज्ञान), और अर्थापत्ति (मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता)। प्रमाणों का दायरा: हर प्रमाण अपने विषय में ही समर्थ होता है (जैसे आँख केवल रूप देख सकती है, शब्द नहीं सुन सकती)। 01:00 - 01:15 | शब्द प्रमाण और आप्त पुरुष शब्द प्रमाण: "आप्त वाक्यं प्रमाणम्"—विश्वासपात्र (आप्त) व्यक्ति का वचन ही प्रमाण होता है। युधिष्ठिर और द्रोणाचार्य का उदाहरण: क्यों द्रोणाचार्य ने भीम की बात नहीं मानी पर युधिष्ठिर की मान लेते? विश्वसनीयता (Credibility) का महत्व। लौकिक vs अलौकिक: लौकिक विषयों में प्रत्यक्ष सबसे प्रबल है, लेकिन अलौकिक विषयों (आत्मा, ईश्वर) में लौकिक प्रमाण (आँख, नाक, तर्क) काम नहीं करते। 01:15 - 01:30 | स्वप्न दृष्टांत और द्वितीय प्रकरण: श्लोक १ स्वप्न का उदाहरण: मेरे स्वप्न का प्रमाण केवल "मैं" हूँ। कोई तर्क या मशीन मेरे स्वप्न के अनुभव को झुठला नहीं सकती। उसी प्रकार अलौकिक अनुभव में अनुभवकर्ता (या वेद) ही प्रमाण है। द्वितीय प्रकरण प्रारम्भ (श्लोक १): "शाब्दमेव प्रमाणं स्यात्..."। ब्रह्म और वेद: ब्रह्म 'परोक्ष' है, इसलिए वहां केवल 'शब्द' (वेद) ही प्रमाण है। वेद के लक्षण: वह अलौकिक है, स्वतंत्र (Self-evident) है और ब्रह्म का साक्षात् प्रतिपादन करता है।