У нас вы можете посмотреть бесплатно BG 11.55 श्रीमद भगवद गीता यथारूप अध्याय 11 श्लोक-55 - गीता का सार или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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Gita Class Chapter 11 Shloka 55 BG Class 11.55 सम्पूर्ण भगवत गीता का सार अध्याय 11 : विराट रूप श्लोक 11.55 मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः | निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव || ५५ || मत्-कर्म-कृत - मेरा कर्म करने में रत; मत्-परमः - मुझको परम मानते हुए; मत्-भक्तः - मेरी भक्ति में रत; सङग-वर्जितः - सकाम कर्म तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त; निर्वैरः - किसी से शत्रुरहित; सर्व-भूतेषु - समस्त जीवों में; यः - जो; माम् - मुझको; एति - प्राप्त करता है; पाण्डव - हे पाण्डु के पुत्र | भावार्थ हे अर्जुन! जो व्यक्ति सकाम कर्मों तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त होकर, मेरी शुद्ध भक्ति में तत्पर रहता है, जो मेरे लिए ही कर्म करता है, जो मुझे ही जीवन-लक्ष्य समझता है और जो प्रत्येक जीव से मैत्रीभाव रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है | तात्पर्य जो कोई चिन्मय व्योम के कृष्णलोक में परम पुरुष को प्राप्त करके भगवान् कृष्ण से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है, उसे स्वयं भगवान् द्वारा बताये गये इस मन्त्र को ग्रहण करना होगा, अतः यह श्लोक भगवद्गीता का सार माना जाता है | भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है, जो उन बद्धजीवों की और लक्षित है, जो इस भौतिक संसार में प्रकृति पर प्रभुत्व जताने में लगे हुए हैं और वास्तविक आध्यात्मिक जीवन के बारे में नहीं जानते हैं | भगवद्गीता का उद्देश्य यह दिखाना है कि मनुष्य किस प्रकार अपने आध्यात्मिक अस्तित्व को तथा भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझ सकता है तथा उसे यह शिक्षा देना है कि वह भगवद्धाम को कैसे पहुँच सकता है | यह श्लोक उस विधि को स्पष्ट रूप से बताता है, जिससे मनुष्य अपने आध्यात्मिक कार्य में अर्थात् भक्ति में सफलता प्राप्त कर सकता है | भक्तिरसामृत सिन्धु में (२.२५५) कहा गया है- अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः | निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते || ऐसा कोई कार्य न करे जो कृष्ण से सम्बन्धित न हो | यह कृष्णकर्म कहलाता है | कोई भले ही कितने कर्म क्यों न करे, किन्तु उसे उनके फल के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए | यह फल तो कृष्ण को ही अर्पित किया जाना चाहिए | उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यापार में व्यस्त है, तो उसे इस व्यापार को कृष्णभावनामृत में परिणत करने के लिए, कृष्ण को अर्पित करना चाहे, तो वह ऐसा कर सकता है | यही कृष्णकर्म है | अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए विशाल भवन न बनवाकर, वह कृष्ण के लिए सुन्दर मंदिर बनवा सकता है, कृष्ण का अर्चाविग्रह स्थापित कर सकता है और भक्ति के प्रमाणिक ग्रंथों में वर्णित अर्चाविग्रह की सेवा का प्रबन्ध करा सकता है | यह सब कृष्णकर्म है | मनुष्य को अपने कर्मफल में लिप्त नहीं होना चाहिए, अपितु इसे कृष्ण को अर्पित करके बची हुई वस्तु को केवल प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए | यदि कोई कृष्ण के लिए विशाल भवन बनवा देता है और उसमें कृष्ण का अर्चाविग्रह स्थापित कराता है, तो उसमें उसे रहने की मनाही नहीं रहती, लेकिन कृष्ण को ही इस भवन का स्वामी मानना चाहिए | यही कृष्णभावनामृत है | किन्तु यदि कोई कृष्ण के लिए मन्दिर नहीं बनवा सकता तो वह कृष्ण-मन्दिर की सफाई में तो लग सकता है, यह भी कृष्णकर्म है | वह बगीचे की देखभाल कर सकता है | जिसके पास थोड़ी सी भी भूमि है - जैसा कि भारत के निर्धन से निर्धन व्यक्ति के पास भी होती है - तो वह उसका उपयोग कृष्ण के लिए फूल उगाने के लिए कर सकता है | वह तुलसी के वृक्ष उगा सकता है, क्योंकि तुलसीदल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं और भगवद्गीता में कृष्ण ने उनको आवश्यक बताया है | पत्रं पुष्पं फलं तोयम् | कृष्ण चाहते हैं कि लोग उन्हें पत्र, पुष्प, फल या थोड़ा जल भेंट करे और इस प्रकार की भेंट से वे प्रसन्न रहते हैं | यह पत्र विशेष रूप से तुलसीदल ही है | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह तुलसी का पौधा लगाकर उसे सींचे | इस तरह गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने को कृष्णसेवा में लगा सकता है | ये कतिपय उदाहरण हैं, जिस तरह कृष्णकर्म में लगा जा सकता है | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय "विराट रूप" का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूरा हुआ | ==================== Join Rupanuga Das on https://chat.whatsapp.com/IapXXEjQRQg... https://telegram.me/bhagwatcharcha https://chat.whatsapp.com/EW1lcGNsvor... / rupanugadasrgm / rupanugadasiskcon / rupanugadas.rgm RupanugaDas | Iskcon Deoghar NHC | HH Radha Govind Maharaj | Krishna katha | Rupanuga das | Bhagwad katha | SB | Geeta class | Sampoorna Gita #online #katha #iskcon #bhagavadgita #bhagvatkatha #gitagyan #gitaclass #Krishna #SrilaPrabhupada #hari #lecture #spiritual #rupanugadas