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Kharsawan 1946 Golikand 2026 me happy new year झारखंड में 1946 के आसपास हुआ आदिवासी संघर्ष और खरसावां गोलीकांड की पृष्ठभूमि 🔶 1. 1946 का समय: आदिवासियों में असंतोष क्यों बढ़ा? 1946 का समय झारखंड के आदिवासियों के लिए बहुत ही संघर्षपूर्ण था। अंग्रेज़ी शासन अपने अंतिम दौर में था, लेकिन आदिवासियों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ था। मुख्य कारण: आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही थी बाहर से आए ज़मींदार, महाजन और ठेकेदार शोषण कर रहे थे आदिवासी समाज को राजनीतिक निर्णयों से अलग रखा गया अलग पहचान और अलग झारखंड राज्य की मांग को नजरअंदाज किया जा रहा था इसी समय आदिवासियों में यह भावना मजबूत हुई कि “अगर हम खुद नहीं लड़ेंगे, तो हमारी जमीन, पहचान और अधिकार सब खत्म हो जाएंगे।” 🔶 2. आदिवासी आंदोलन (1946–1947) 1946–47 में छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासी आंदोलन तेज़ हो गया। आदिवासी सभाएँ, जुलूस और विरोध प्रदर्शन होने लगे लोग अलग झारखंड राज्य की मांग करने लगे यह आंदोलन ज़्यादातर शांतिपूर्ण था जयपाल सिंह मुंडा जैसे नेताओं ने आदिवासी एकता पर ज़ोर दिया आदिवासी चाहते थे कि: उनका इलाका ओडिशा या किसी और राज्य में न मिलाया जाए उनकी संस्कृति, जमीन और शासन में भागीदारी बनी रहे लेकिन सरकार और रियासती प्रशासन ने इस आंदोलन को खतरे के रूप में देखा। 🔶 3. खरसावां रियासत और तनाव खरसावां एक रियासत थी। आज़ादी के बाद इसे ओडिशा में मिलाने की तैयारी चल रही थी। आदिवासी इसका विरोध कर रहे थे। उनका साफ कहना था: “हम ओडिशा में नहीं, झारखंड में रहना चाहते हैं।” 1946–47 में इस मुद्दे पर कई जगह: पुलिस और आदिवासियों के बीच झड़पें हुईं सभाओं पर रोक लगाई गई नेताओं को डराया गया यह सब 1948 के बड़े हादसे की भूमिका (background) बन गया। 🔶 4. खरसावां गोलीकांड – 1 जनवरी 1948 (परिणाम) हालाँकि गोलीकांड 1948 में हुआ, लेकिन उसकी लड़ाई और आंदोलन 1946 से चल रहे थे। 1 जनवरी 1948 को: बड़ी संख्या में आदिवासी खरसावां में एक सभा के लिए इकट्ठा हुए वे शांतिपूर्वक अपनी मांग रख रहे थे अचानक पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला दीं परिणाम: सैकड़ों नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के अनुसार हज़ारों आदिवासी मारे गए लाशें नदी और जंगलों में गिरती रहीं कई घायल लोग इलाज के बिना मर गए सरकारी आंकड़े कम बताए गए, लेकिन सच्चाई आज भी आदिवासी समाज के दिल में जिंदा है। 🔶 5. इतिहास में स्थान इसे कई लोग “आज़ाद भारत का जालियांवाला बाग” कहते हैं यह घटना बताती है कि आज़ादी के बाद भी आदिवासियों को न्याय नहीं मिला 1946 से शुरू हुई आदिवासी लड़ाई → 1948 में खून में डुबो दी गई