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Пуруша-сукта входит в состав Риг Веды, мандала 10, гимн 90. Состоит из 16-ти стихов. Автор, по преданию, – Нараяна. Maharishi Vedic Pandits – Purusha Suktam सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात | सभूमिं विश्वतो वर्त्वात्यतिष्ठद दशाङगुलम || पुरुष एवेदं सर्वं यद भूतं यच्च भव्यम | उताम्र्तत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति || एतावानस्य महिमातो जयायांश्च पूरुषः | पादो.अस्यविश्वा भूतानि तरिपादस्याम्र्तं दिवि || तरिपादूर्ध्व उदैत पुरुषः पादो.अस्येहाभवत पुनः | ततो विष्वं वयक्रामत साशनानशने अभि || तस्माद विराळ अजायत विराजो अधि पूरुषः | स जातोत्यरिच्यत पश्चाद भूमिमथो पुरः || यत पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत | वसन्तोस्यासीदाज्यं गरीष्म इध्मः शरद धविः || तं यज्ञं बर्हिषि परौक्षन पुरुषं जातमग्रतः | तेन देवा अयजन्त साध्या रषयश्च ये || तस्माद यज्ञात सर्वहुतः सम्भ्र्तं पर्षदाज्यम | पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान गराम्याश्च ये || तस्माद यज्ञात सर्वहुत रचः सामानि जज्ञिरे | छन्दांसिजज्ञिरे तस्माद यजुस्तस्मादजायत || तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः | गावो हजज्ञिरे तस्मात तस्माज्जाता अजावयः || यत पुरुषं वयदधुः कतिधा वयकल्पयन | मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते || बराह्मणो.अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कर्तः | ऊरूतदस्य यद वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत || चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत | मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च पराणाद वायुरजायत || नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो दयौः समवर्तत | पद्भ्यां भूमिर्दिशः शरोत्रात तथा लोकानकल्पयन || सप्तास्यासन परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कर्ताः | देवायद यज्ञं तन्वाना अबध्नन पुरुषं पशुम || यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि परथमान्यासन | ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याःसन्ति देवाः ||