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महर्षि रमण से बातचीत : आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान का गहन रहस्य Ramana Maharshi के साथ हुई अनेक वार्तालापों में आत्मज्ञान (Self-Realization) और ब्रह्मज्ञान (Knowledge of the Absolute) का अत्यंत सरल, प्रत्यक्ष और अनुभवजन्य वर्णन मिलता है। उनका उपदेश शास्त्रीय तर्क से अधिक सीधे आत्म-अनुभव पर आधारित था। आत्मज्ञान क्या है? महर्षि रमण कहते थे— “आत्मज्ञान कोई नई वस्तु प्राप्त करना नहीं है, बल्कि जो सदैव है, उसी को पहचान लेना है।” उनके अनुसार मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध ‘मैं-मैं’ (अहम्-स्फुरण) की चेतना है। जब साधक ‘मैं कौन हूँ?’ (आत्म-विचार) की साधना करता है, तब वह मन के स्रोत में प्रवेश करता है। जैसे ही ‘अहंकार’ का मूल खोजा जाता है, वह स्वयं लय हो जाता है और शुद्ध आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है। ब्रह्मज्ञान क्या है? महर्षि स्पष्ट करते थे कि आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान में कोई भेद नहीं है। आत्मा ही ब्रह्म है। जब व्यक्ति अपने भीतर के ‘मैं’ को उसके शुद्ध रूप में जान लेता है, तब उसे अनुभव होता है कि वही चेतना समस्त जगत में व्याप्त है। यह अनुभव बौद्धिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति है — जहाँ कर्ता, कर्म और क्रिया का भेद मिट जाता है। आत्म-विचार की पद्धति महर्षि रमण का मुख्य साधन था — “नान यार?” (मैं कौन हूँ?) जब भी कोई विचार उठे, पूछो — यह विचार किसके लिए है? उत्तर आएगा — मेरे लिए। फिर पूछो — मैं कौन हूँ? इस प्रकार मन बार-बार अपने स्रोत में लौटता है। अंततः मन शांत होकर आत्मा में विलीन हो जाता है। यही सच्चा ध्यान है। मौन का महत्व महर्षि कहते थे कि सर्वोच्च उपदेश मौन है। शब्द केवल संकेत हैं; सत्य का अनुभव भीतर की शांति में होता है। जब मन पूर्णतः शांत हो जाता है, तब आत्मा स्वयं को प्रकट करती है। आत्मज्ञान की अवस्था आत्मज्ञानी के लिए संसार का अस्तित्व नकारा नहीं जाता, परंतु उसका बंधन समाप्त हो जाता है। वह जानता है कि सब कुछ उसी एक चेतना का खेल है। उसमें न भय रहता है, न मोह, न अहंकार — केवल शांति और आनंद का अखंड अनुभव। इस प्रकार महर्षि रमण की वार्ताओं का सार यही है कि मुक्ति भविष्य में मिलने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेने का नाम है। “स्वयं को जानो — वही ब्रह्म को जानना है।”