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सूरजकुंड मेला यात्रा आज अपनी साइकिल के दो पहिये निकल चले 39 वें सूरजकुंड अंतराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला, फरीदाबाद के उस भव्य प्रांगण में जहाँ मैं पहली बार पहुँचा। 6 फरवरी की सुबह घर से यह सोच कर निकला कि इस समय जाम कम होगा, लेकिन कालंदी कुंज के लगभग तीस मिनट के भारी जाम ने लोगों को रुकने के लिए बाध्य कर दिया। बस यहीं पर मैं और मेरी साइकिल चल रही थी बिंदास। बल्लभगढ़ की ओर से होते पहुँच गया सीधे फरीदाबाद, सूरजकुंड मेला। दस बजे के आसपास गेट पर पहुँचने पर वहाँ साइकिल पार्क करने की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा, सुरक्षाकर्मियों के सहयोग से गेट के नज़दीक ही साइकिल को बांध दिया गया। मेले में चारों ओर रौनक थी और इसी चहल-पहल के बीच विभिन्न वस्तुओं को देखने और खरीदने के लिए देश-विदेश से आए आगंतुकों तथा स्थानीय लोगों का हजूम उमड़ा हुआ था। इस भव्य मेले में एक बार तो जाना बनता है। यह बहुत बड़े इलाके में फैला हुआ है। यहां पर अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ कुछ विदेशी स्टॉल भी लगे हुए थे। रंग-बिरंगे परिधानों, आभूषणों, खान-पान तथा तरह-तरह के अनेक सामानों से सुसज्जित आकर्षक बाजार मन को मोह रहे थे। हरियाणवी लोकगायन एवं नृत्य पर कलाकारों का कलात्मक संयोजन देखते ही बनता था। राजस्थानी वाद्ययंत्र ढोल, नगाड़े पर नृत्य करते हुए युवाओं का प्रदर्शन मुख्य द्वार पर ही देखने को मिला। पहली बार नगाड़ा बजाने का अवसर और उसका आनंद भी मुझे यहाँ मिला। अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करते कुछ पेशेवर कलाकार ऐसे भी थे जो अपने पारंपरिक पोशाकों में, चेहरे पर रंग-बिरंगी आकृतियाँ बनाकर, विभिन्न भाव-भंगिमाओं से लोगों का मनोरंजन कर रहे थे। चूँकि भजन भरे पेट ही होता है तो कुछ भोजन की व्यवस्था के लिए कुछ ढूंढने लगा । वैसे भी घर से कुछ खाकर नहीं चला था तो अब भूख लग आई थी। मैं उस ओर चल दिया जहां पर खाने-पीने से संबंधित स्टाल लगे हुए थे। यहाँ मुझे दिखाई दिया ‘गोहना का मशहूर जलेबा' जो आई कैचिंग था। मैं मीठे का बहुत शौक़ीन हूं और सामने लजीज जलेबा देखकर जिह्वा ललचाने लगी। फिर क्या था ले लिया 100 रुपए का एक पीस। यह देखने में जितना सुंदर था खाने में उतना ही स्वादिष्ट निकला। खूब स्वाद से खाया यह सोच कर कि पाँच किलोमीटर अधिक चला ली जाएगी साइकिल। ‘वीटा’ हरियाणा डेयरी विकास द्वारा निर्मित उत्पादों को लेने की भीड़ भी खूब दिखाई दी। 'वीटा' की आइसक्रीम, लस्सी और ठंडा मीठा मलाई वाला दूध वाकई कमाल का था। इन तमाम आकर्षणों को देखते हुए मुझे उस वक्त जैनेंद्र का बाजार दर्शन याद आ रहा था जहाँ वे अति संयम, संतोष और लक्ष्य को ध्यान रखने के बात कहते हैं, ताकि आँखों के रस्ते बाज़ार के जादू का आकर्षण आप को घेर न ले, हालाँकि मैंने तो भगत जी की उँगली पकड़ रखी थी और उनके पीछे-पीछे चलकर मन:स्थिति से संपूर्ण बाज़ार का पूर्ण आनंद ले रहा था। करीब छ: घंटे मेले का आनंद लेने के बाद मैं तीन बजे वहां से निकला। कुछ और नए रास्तों की खोजबीन करते हुए, महरौली बदरपुर रोड से कुतुबमीनार, ग्रीन पार्क, इंडिया गेट और वापस वसुंधरा, गाज़ियाबाद पहुँचा। यह लगभग 95 किलोमीटर की सुखद, आनंदमय और संतोषपूर्ण यात्रा रही। अगली बार पुन: एक नए गंतव्य की तैयारी के साथ फिर मिलेंगे साथियो।