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15 अगस्त : 15 कहानियां ये कहानी है एक ऐसी वीरांगना की जो अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए मात्र 21 साल की उम्र में शहीद हो गई. मगर इस शहादत ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाये. ये कहानी है प्रीतिलता वादेदार की. 1911 में तत्कालीन बंगाल के चटगाँव में जन्मी प्रीतिलता का बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों की ओर झुकाव था. कॉलेज में आ कर उनके विचार और भी मज़बूत हुए. नतीजा यह हुआ कि क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों के चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने कोलकाता युनिवर्सिटी में प्रीतिलता की डिग्री पर रोक लगा दी. दिलचस्प बात ये कि, 1932 में अंग्रेजो द्वारा प्रीतिलता की रोकी गयी तब की डिग्री 2012 में जाकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम के नारायणन की पहल पर 80 साल बाद जारी की गयी. खैर... इसके बाद प्रीतिलता वापस चटगांव लौट आईं और एक बालिका विद्यालय में पढ़ाने लगीं. इसी समय उनका परिचय प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता सूर्यसेन से हुआ, जिन्हें मास्टर दा के नाम भी जाना जाता है. इस परिचय के बाद प्रीतिलता वादेदार के क्रांतिकारी विचारों को हवा मिलनी शुरू हुईं. मास्टर दा से प्रीतिलता ने बन्दूक आदि चलाने का विधिवत प्रशिक्षण लिया. 18 अप्रैल 1930 को अंग्रेजों को देश से बाहर करने के लिए इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) का गठन किया गया. प्रीतिलता वाडेदार ने काफी संघर्ष के बाद आईआरए जॉइन किया. क्योंकि क्रांतिकारी, महिलाओं को अपने ग्रुप में शामिल करने के खिलाफ थे. आईआरए के गठन से पूरे बंगाल में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी. इसी दिन सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांतिकारियों के दस्ते के साथ मिलकर प्रीतिलता ने कई मोर्चो पर अंग्रेजों से लोहा लिया. वो रिज़र्व पुलिस लाइन पर क्रांतिकारियों के कब्जे और टेलीफोन ऑफिस पर हुए आक्रमणों में भी शामिल थीं. विद्रोह इतना आक्रामक था कि अंग्रेजी हुक्मरान भाग निकले. और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया। इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। घटना का असर कई महीनों तक रहा. अब बात साल 1932 की. पहाड़तली के एक यूरोपियन क्लब में एक बोर्ड लगा था जिसपर साफ-साफ लिखा था- ‘डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाऊड’. साफ था कि इंडियंस की तुलना कुत्तों से की गई थी. फिर क्या था अंग्रेजों को सबक सिखाने की योजना बनाई गई. और 23 सितम्बर की शाम प्रीतिलता ने अपने कुछ साथियों के साथ क्लब में हमला बोल दिया. इस हमले में एक योरोपियन महिला की मौत हुई और कई लोग बुरी तरह घायल हुए. इस दौरान प्रीतिलता को भी गोली लगी. मगर पकड़े जाने के बजाय उन्होंने सायनाइड खा कर शहीद होना बेहतर समझा. प्रीतिलता वादेदार 1857 के विद्रोह के बाद स्वतंत्रता के लिए हुए किसी सशस्त्र विद्रोह में शहीद होने वाली पहली महिला थीं| Website: https://www.dalmiacement.com/ Like Us: @facebook : / mydalmiacement Follow Us: @twitter : / mydalmiacement