У нас вы можете посмотреть бесплатно कार्कोटक कालसर्प दोष निवारण स्तोत्रम् | ध्यान–विनियोग–न्यास सहित | लेखरंजन प्रणीत или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
जब जन्मकुंडली में अष्टम भाव में राहु और द्वितीय भाव में केतु स्थित होकर समस्त ग्रह उनके मध्य आ जाते हैं, तब कार्कोटक कालसर्प दोष माना जाता है। इससे वाणी-दोष, पारिवारिक क्लेश, ऋण-बाधा, मानसिक भय तथा गुप्त शत्रु पीड़ा उत्पन्न हो सकती है। इस वीडियो/पाठ में प्रस्तुत है — 🔱 श्री लेखरंजन प्रणीत स्तोत्रम् 🔱 पूर्ण ध्यान, विनियोग और न्यास सहित 🔱 दोष शांति एवं ग्रह-बाधा निवारण हेतु विशेष पाठ-विधि नियमित श्रद्धा से पाठ करने पर ✨ वाक्सिद्धि ✨ पारिवारिक सौहार्द ✨ ऋण-मुक्ति ✨ राहु-केतु शांति ✨ मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। विशेष फल सोमवार, प्रदोषकाल या नागपंचमी से आरंभ करने पर मिलता है। 🔖 #कार्कोटक_कालसर्प_दोष #कालसर्प_दोष_निवारण #राहु_केतु_शांति #नाग_स्तोत्र #शिव_उपासना #लेखरंजन #ज्योतिष_उपाय #ध्यान_विनियोग_न्यास #वैदिक_स्तोत्र __ कार्कोटक कालसर्प दोष निवारणार्थ श्री-लेखरंजन-प्रणीतम् स्तोत्रम् ध्यानम् नीलाम्बरं नागमणि-दीप्त-कायं फणामणि-प्रोद्यदनन्त-रूपम्। अष्टमगं राहु-विभूतियुक्तं ध्यायेत् कर्कोटक-सर्पनाथम्॥ शिवाङ्कसंस्थं शशिधार-शीर्षं त्रिनेत्रमुग्रं करुणैकसिन्धुम्। द्वितीयगे केतु-समन्वितं तं दोषप्रणाशं शरणं प्रपद्ये॥ विनियोगः ॐ अस्य श्रीकार्कोटक-कालसर्प-दोष-निवारण-स्तोत्रस्य ऋषिः – भगवान कर्कोटक नागराज छन्दः – अनुष्टुप् देवता – भगवान शिव सह राहु-केतु बीजम् – “ह्रीं” शक्तिः – “सर्पशक्तिः” कीलकम् – “क्लीं” मम सर्वदोष-शान्त्यर्थे, कार्कोटक-कालसर्प-दोष-निवारणार्थे जपे विनियोगः ॥ करन्यासः ॐ कर्कोटकाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ राहवे तर्जनीभ्यां नमः। ॐ केतवे मध्यमाभ्यां नमः। ॐ सर्पेश्वराय अनामिकाभ्यां नमः। ॐ नीलदेहाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ दोषनाशाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥ अङ्गन्यासः ॐ कर्कोटकाय हृदयाय नमः। ॐ राहवे शिरसे स्वाहा। ॐ केतवे शिखायै वषट्। ॐ सर्पनाथाय कवचाय हुं। ॐ नीलमणये नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ कालसर्पदोषनाशाय अस्त्राय फट्॥ स्तोत्रम् १ अष्टमे राहुस्थिते भीतिदाते, द्वितीये केतु-विचित्र-वाणी। मध्यगतैर्ग्रहगणैरबद्धे, कर्कोटकोऽयं मम दुःखहारी॥ २ नागाधिराज नमस्तेऽस्तु नित्यं, दोषान् दह त्वं हुतभुगिवाग्निः। वाक्सिद्धिदं सौख्यकरं प्रसन्नं, कुरुष्व मे बन्धुविरोधनाशम्॥ ३ गूढारिभीतिं च ऋणप्रकोपं, दुर्भाग्यतां चापि विनाशयाशु। राहु-प्रभावं शमय त्वदीयं, केतु-प्रकोपं हर शान्तिदायक॥ ४ शम्भोः कृपाभाजन-नागराज, भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि भक्ते। लेखरंजनोक्तं स्तवमेतदीयं, यः पाठयेत् तस्य शुभं भवेत्॥ ५ निशीथे वा प्रदोषकाले, सोमवासरे वा विशेषतश्च। जप्त्वा स्तवं भक्तिभरेण युक्तः, कार्कोटकदोषविनाशमाप्नुयात्॥ फलश्रुतिः इदं स्तोत्रं पठेन्नित्यं शुद्धचित्तः समाहितः। कालसर्पभयं नास्ति वाक्सिद्धिर्भवति ध्रुवम्॥ ऋणविघ्नभयं नश्येत् कुलकलहो विनश्यति। अष्टमे राहुदोषश्च द्वितीयस्थ-केतुशान्तिकृत्॥ __ कार्कोटक कालसर्प दोष निवारण स्तोत्र 📿 विस्तृत पाठ-विधि यह पाठ विशेषतः तब किया जाता है जब कुंडली में अष्टम भावस्थ राहु और द्वितीय भावस्थ केतु से कार्कोटक कालसर्प योग बन रहा हो। 🔱 १. आरम्भ का शुभ समय सोमवार, प्रदोष काल, या नाग पंचमी से प्रारम्भ श्रेष्ठ। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त (4–6 AM) या संध्या समय उपयुक्त। 21 दिन, 40 दिन या 108 दिन का संकल्प उत्तम। 🪔 २. आवश्यक सामग्री शिवलिंग या भगवान शिव का चित्र कच्चा दूध, गंगाजल काला तिल कुशा नाग-नागिन का प्रतीक (चित्र/प्रतिमा) तिल के तेल का दीपक 🧘 ३. प्रारम्भिक शुद्धि स्नान कर श्वेत या हल्के वस्त्र धारण करें। आसन पर पूर्व या उत्तरमुख होकर बैठें। तीन बार प्राणायाम करें। संकल्प लें — “मम जन्मकुंडलीस्थित कार्कोटक कालसर्प दोष शान्त्यर्थं, सर्वविघ्न-निवारणार्थं अहं एतत् स्तोत्रपाठं करिष्ये।” 🔹 ४. पूजन क्रम शिवलिंग पर जल, दूध और काला तिल अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” का 108 जप करें। राहु-केतु शांति हेतु प्रार्थना करें। तत्पश्चात — ध्यानम् विनियोग करन्यास अङ्गन्यास मूल स्तोत्र पाठ 📖 ५. जप संख्या न्यूनतम — 11 बार विशेष अनुष्ठान — 21 या 108 बार अत्यंत पीड़ा होने पर — 1 माला (108) प्रतिदिन 40 दिन 🌺 ६. समापन “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” से पाठ पूर्ण करें। काला तिल दान करें। संभव हो तो ब्राह्मण या निर्धन को अन्न दान करें। ✨ विशेष निर्देश पाठ के समय मन शांत रखें। क्रोध, असत्य भाषण और मांस-मद्य त्यागें। सोमवार को उपवास रखने से शीघ्र फल मिलता है।