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जीवनका भारतीय प्रतिमान - अध्याय 12 । जीवन दृष्टि । philosophy । जीवन तत्वज्ञान । जीवन दृष्टि याने जीवन की तरफ देखने की दृष्टि. इसमे मानवी जीवन के घटक - व्यक्ति खुद, संपूर्ण मानव समाज और सृष्टी (सृष्टी के सारे अस्तित्व - पेडपौधे, पशू, पक्षी, पंचमहाभूत सहित) आते है. इन सब के बारे मे मानव के विचार क्या है, वह इनके संबंध में क्या अनुभव करता है, मानव खुद को इन सभी अस्तित्वों से कैसे जोडता है इस पर जीवनदृष्टि निर्भर करती है. इस जीवनदृष्टि के अनुरूप मानव का आचरण होता है उसीके सुसंगत समाज की व्यवस्थाएँ खडी की जाती है. जीवनदृष्टि अलग अलग होने से अलग अलग समाजों के आचरण और व्यवस्थाओं में फरक आता है यह हमने अनुभव किया है. किसी समाज की जीवनदृष्टि कैसे विकसित होती है? क्या यह लंबे समय चलनेवाली प्रक्रिया है? क्या मनुष्य निर्माण - मनुष्य का विकास उस समाज के जीवनदृष्टि के आधार पर होता है? यह सभी बातें विचारणीय है. आइए जानते है हिंदू- भारतीय जीवनदृष्टि और व्यवहार सूत्र,