У нас вы можете посмотреть бесплатно शुक्रवार को यह संतोषी माता स्तुति सुनते ही पूर्ण होंगी सभी मनोकामनाएँ 🌺✨ или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
यह दिव्य श्री संतोषी माता स्तुति विशेष रूप से शुक्रवार के दिन सुनने और पाठ करने के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है 🙏🌺 जो भक्त श्रद्धा से इस स्तुति का पाठ करता है, उसके जीवन में संतोष, सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। माँ संतोषी की कृपा से घर में कलह समाप्त होता है, धन-धान्य की वृद्धि होती है और सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। 🌼 शुक्रवार को अवश्य सुनें और माता की कृपा प्राप्त करें। #SantoshiMata #FridaySpecial #SantoshiMataStuti #Bhakti #HinduDevotional #MaaSantoshi #ShukravarBhajan #SanatanDharma #DevotionalShorts #Mahalakshmi #new जयति जयति संतोषी माता, विश्ववन्दिता, भक्तवत्सला, करुणामयी जननी। त्वं शान्तिरूपा, त्वं लक्ष्मीरूपा, त्वं सिद्धिदात्री, वरप्रदा शुभकरी ॥ सुवर्णवर्णा कमलासनस्था, चतुर्भुजा वरदाभयदायिनी। त्रिनेत्रधारिणी त्रैलोक्यपूज्या, भवभयहारिणी मंगलमयी ॥ शुक्रवासरे विशेषपूज्या, साध्वीजनानां हृदयविहारिणी। गुड़चणकप्रियभोजने रता, साधकानां दुःखविनाशकारिणी ॥ संतोषरूपिणी मातः त्वमेव, लोभमोहविनाशिनी शुभदा। क्षमा, दया, शीलसमन्विता, सर्वसंपत्प्रदायिनी सद्गता ॥ यत्र त्वं पूजिता श्रद्धया, तत्र नित्यं धनधान्यसमृद्धिः। कलहदुःखविनाशः सदा, सौख्यशान्तिप्रवृद्धिर्भवति ॥ भक्तानामाशां पूर्णयन्ती, करुणासिन्धुर्मातरनुपमा। अनाथनाथे नमस्ते सदा, शरणागतवत्सले अम्बिके ॥ त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवि देवि ॥ व्रतपालनेन तव प्रसादात्, दीनजनोऽपि भवति धनाढ्यः। सन्ततिसौख्यं गृहशान्तिरस्ति, रोगशोकविनाशो भवति ॥ त्वदीयं नाम यः सदा जपति, “जय संतोषी मातः” इति भक्त्या। तस्य गृहे नित्यं मंगलं, सर्वाभीष्टफलप्राप्तिर्भवति ॥ दुष्टदैन्यविनाशिनी त्वं, सौभाग्यसमृद्धिप्रदायिनी। साधुसंतजनसंसेविता, भवसागरतरिणी शुभे ॥ आर्तत्राणपरायणे अम्ब, विनयेन वयं त्वां प्रार्थयामः। कुरु कृपां मयि दीनबन्धो, देहि मे संतोषं परमानन्दम् ॥ नमस्ते संतोषी जगदम्बिके, नमस्ते भक्तजनप्रियकारिणि। नमस्ते करुणामृतवर्षिणि, नमस्ते मंगलदायिनि मातः ॥ इति स्तुत्वा भक्तिभावेन, यः पठति श्रद्धया समाहितः। तस्य जीवनं भवति पावनं, संतोषसमृद्ध्या सदाऽन्वितम् ॥