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यह वीडियो "आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी (बिहार)" चैनल का है, जिसमें "गर्भ संवाद" (अजन्मे बच्चे से बातचीत करने की कला और विज्ञान) के गहरे अर्थ और महत्व को समझाया गया है। वीडियो का मुख्य सारांश यहाँ दिया गया है: मुख्य विचार: गर्भ संवाद क्या है? गर्भ संवाद केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अपने अजन्मे बच्चे से सचेत और प्यार भरी बातचीत करने की एक कला है [00:13]। वीडियो का मूल मंत्र यह है कि बच्चे के श्रेष्ठ जीवन की नींव जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भ में ही पड़ जाती है [00:26]। प्राचीन और आधुनिक विज्ञान का मेल प्राचीन उदाहरण: भारतीय पौराणिक कथाओं में माता मदालसा, अभिमन्यु, भक्त प्रहलाद और अष्टावक्र के उदाहरण मिलते हैं, जो बताते हैं कि गर्भ में शिशु सुन सकता है और ज्ञान प्राप्त कर सकता है । आधुनिक विज्ञान (Epigenetics): विज्ञान भी अब मानता है कि गर्भ में बच्चा 'सोल कॉन्शियस' (Soul Conscious) होता है और उसका अवचेतन मन बहुत सक्रिय होता है। मां की भावनाएं और विचार बच्चे के जींस तक पर असर डालते हैं । बच्चे का विकास और संवाद के स्तर विकास की समयरेखा: चौथे महीने में बच्चा आवाजें पहचानने लगता है और छठे महीने तक वह भावनाओं को समझने लगता है । संवाद के चार स्तर ]: वैखरी: बोले गए शब्द। मध्यम: भावनाएं और बॉडी लैंग्वेज। पश्यंती: विचारों का कनेक्शन (एक प्रकार की टेलीपैथी)। परा: आत्मा का आत्मा से सीधा कनेक्शन। व्यावहारिक तरीके और लाभ कैसे करें: बच्चे से प्यार से बात करें, अपने अनुभव साझा करें और घर के अन्य सदस्यों को भी सकारात्मक बातचीत में शामिल करें। माध्यम: ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान करना, सकारात्मक संगीत सुनना, अच्छी किताबें (स्वाध्याय) पढ़ना और कहानियां सुनाना बहुत प्रभावी होता है । मां की भूमिका: मां का अपने विचारों और तनाव पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है क्योंकि हर नकारात्मक विचार को तुरंत सकारात्मकता में बदलना चाहिए । निष्कर्ष वीडियो एक शक्तिशाली संदेश के साथ समाप्त होता है: "गर्भ संवाद केवल शिशु निर्माण नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है" । एक बेहतर समाज की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर गर्भ के संस्कारों से ही होती है।