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“कोई कर्म तुम्हारा नहीं” — यह सुनते ही मन सवाल करता है… अगर मैं कर्ता नहीं, तो फिर कौन? अष्टावक्र गीता का यह अद्वैत संदेश हमें भीतर तक हिला देता है। हम जीवन भर अपने आप को कर्ता मानते हैं — “मैंने किया”, “मैं सफल हुआ”, “मैं असफल हुआ।” लेकिन अष्टावक्र कहते हैं — तुम शरीर नहीं हो, तुम मन नहीं हो, तुम विचार नहीं हो। तुम केवल साक्षी हो। जब यह समझ गहराई से उतरती है, तब जीवन का पूरा बोझ हल्का हो जाता है। न पछतावा रहता है। न अभिमान। न कर्म का भय। कर्म होते रहते हैं — पर भीतर से तुम अछूते रहते हो। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, वैसे ही जीवन की घटनाएँ घटती हैं। पर तुम आकाश हो, बादल नहीं। इस वीडियो में हम समझेंगे: कर्ता भाव क्या है? अहंकार कैसे बंधन बनाता है? अष्टावक्र गीता का वास्तविक संदेश क्या है? “कोई कर्म तुम्हारा नहीं” का अनुभव कैसे संभव है? यह ज्ञान संसार छोड़ने की बात नहीं करता, बल्कि भ्रम छोड़ने की बात करता है। जब कर्तापन गिरता है, तभी सच्ची स्वतंत्रता जन्म लेती है। अगर आप भी जीवन के बोझ से मुक्त होना चाहते हैं… अगर आप जानना चाहते हैं कि वास्तविक “मैं” कौन है… तो यह वीडियो अंत तक अवश्य देखें। 🔔 ऐसे ही गहरे आध्यात्मिक ज्ञान के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें। 📿 इस वीडियो को उन लोगों के साथ साझा करें जो सत्य की खोज में हैं। अष्टावक्र गीता का संदेश स्पष्ट है — तुम सदा से मुक्त हो। वास्तव में, कोई कर्म तुम्हारा नहीं।