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कबीर के दोहे-9 #kabirdohawali #kabirkedohe #kabirbani #amritwani #kabirdas #bhakti #bhajan #motivate create: suno ai suno ai pro plan suno ai comercial use plan discription: कबीर दास के 50 लोकप्रिय दोहे- Kabir Das ...कबीर के दोहे (Kabir ke dohe) संत कबीर द्वारा रचित छोटी, अर्थपूर्ण कविताएँ हैं जो जीवन, भक्ति, नैतिकता, और आडंबरों (जैसे जातिवाद, अंधविश्वास) पर गहरा ज्ञान देती हैं, जिनमें सरल भाषा में 'साधु', 'मन', 'काल' और 'ईश्वर' जैसे विषयों पर गहरी बातें कही गई हैं, जैसे 'निंदक नियरे राखिए' या 'काल करे सो आज कर', जो आज भी प्रासंगिक हैं और जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं. कबीर के दोहों की मुख्य विशेषताएँ (Key Features of Kabir's Dohas): सरल भाषा (Simple Language): कबीर ने अपनी बात कहने के लिए खड़ी बोली, अवधी, और ब्रज जैसी लोक भाषाओं का प्रयोग किया, जिससे आम जनता भी उन्हें समझ सके. गहरा अर्थ (Deep Meaning): हर दोहे में कई परतें होती हैं, जो सतही अर्थ से कहीं ज़्यादा गहरी बातें बताती हैं (जैसे 'जल में कुंभ, कुंभ में जल' जो आत्मा-परमात्मा की एकता बताता है). नैतिक शिक्षा (Moral Teachings): ये दोहे हमें सही-गलत, परोपकार, संतोष, और समय का सदुपयोग सिखाते हैं (जैसे 'ऐसी करनी ना करो, पीछे हँसे सब कोय'). आडंबरों पर प्रहार (Attack on Rituals): कबीर ने धार्मिक आडंबरों, मूर्तिपूजा और जातिगत भेदभाव की कड़ी आलोचना की, जो उनके दोहों में स्पष्ट दिखता है. भक्ति और प्रेम (Devotion and Love): ये दोहे ईश्वर के प्रति प्रेम और सच्ची भक्ति पर ज़ोर देते हैं, जो बाहरी दिखावे से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है (जैसे 'तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार'). lyrics: कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर | ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर || कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार | एक दिन है सोवना, लंबे पाँव पसार || कबीरा आप ठागइए, और न ठगिये कोय आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय || गारी ही से उपजे, कलह कष्ट और भीच | हारी चले सो साधू है, लागी चले तो नीच || जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी | राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारी || जो तोकू कांता बुवाई, ताहि बोय तू फूल तोकू फूल के फूल है, बंकू है तिरशूल || जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस | मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास || ते दिन गए अकार्थी, सांगत भाई न संत | प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत || तीर तुपक से जो लादे, सो तो शूर न होय माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय || तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय | सहजी सब बिधि पिये, जो मन जोगी होय || नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मेल न जाय| मीन सदा जल में रही, धोये बॉस न जाय || पांच पहर धंधा किया, तीन पहर गया सोय | एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय || पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय | अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय || माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय | भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय || या दुनिया में आ कर, छड़ी डे तू एट | लेना हो सो लिले, उठी जात है पैठ || रात गवई सोय के दिवस गवाया खाय | हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय || राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय | जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय || संगती सो सुख उपजे, कुसंगति सो दुःख होय | | कह कबीर तह जाइए, साधू संग जहा होय साहेब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय ज्यो मेहंदी के पात में, लाली राखी न जाय || साईं आगे सांच है, साईं सांच सुहाय | चाहे बोले केस रख, चाहे घौत मुंडाय || लकड़ी कहे लुहार की, तू मति जारे मोहि | एक दिन ऐसा होयगा, मई जरौंगी तोही || ज्ञान रतन का जतानकर, माटि का संसार आय कबीर फिर गया, फीका है संसार || रिद्धि सिद्धि मांगूं नहीं, माँगू तुम पी यह | निशिदिन दर्शन साधू को, प्रभु कबीर कहू देह || न गुरु मिल्या ना सिष भय, लालच खेल्या डाव | दुनयू बड़े धार में, छधी पाथर की नाव || कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीश स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीष |