У нас вы можете посмотреть бесплатно कबीर के दोहे -8 kabirwani или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
कबीर के दोहे -8 kabirwani #kabirdohawali #kabirkedohe #kabirdas #kabirbhajan #bhakti #kabirbhajan audio : suno ai paid plan suno ai pro plan suno ai discription: कबीर के दोहे (Kabir Ke Dohe) संत कबीर द्वारा रचित छोटी, शिक्षाप्रद छंद हैं जो जीवन, भक्ति, ईश्वर, और समाज के बारे में गहरी सीख देते हैं, जिनमें निंदक को पास रखने, समय का सदुपयोग करने, और आडंबर छोड़कर सच्चे ज्ञान की ओर बढ़ने जैसे जीवन-मूल्यों पर ज़ोर दिया गया है। इन दोहों का मुख्य सार है ईश्वर की एकता, आंतरिक शुद्धि, और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति, जो सरल भाषा में जीवन के गहरे अर्थों को उजागर करते हैं। कबीर दोहों की प्रमुख विशेषताएँ: साधारण भाषा: कबीर ने अपनी बात कहने के लिए सरल और आम बोलचाल की भाषा (सधुक्कड़ी) का प्रयोग किया, जिससे हर कोई उनकी बात समझ सके। गहरा अर्थ: हर दोहे में एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा होता है, जो जीवन की सच्चाई बताता है। नैतिक शिक्षा: ये दोहे हमें जीवन जीने का सही तरीका सिखाते हैं, जैसे क्रोध त्यागना, झूठ न बोलना, और दूसरों की मदद करना। ईश्वर की एकता: कबीर ने धर्मों और आडंबरों के पार जाकर ईश्वर के एक होने का संदेश दिया। स्व-चिंतन: वे हमें बाहरी दुनिया में बुराई ढूंढने के बजाय अपने अंदर झाँकने और स्वयं को सुधारने की प्रेरणा देते हैं।lirics :दया भाव हृदय नहीं, ज्ञान थके बेहद | ते नर नरक ही जायेंगे, सुनी सुनी साखी शब्द || जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम | दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम || ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय | नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय || जब ही नाम हिरदय धर्यो, भयो पाप का नाश | मानो चिनगी अग्नि की, परी पुरानी घास || सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह | शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह || बाहर क्या दिखलाये, अंतर जपिए राम | कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम || फल कारन सेवा करे, करे ना मन से काम| कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम || कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा || सोना सज्जन साधू जन, टूट जुड़े सौ बार दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एड्के ढाका दरार || जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय | यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए || प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय | चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाए || साधू सती और सुरमा, इनकी बात अगाढ़ आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध || हरी सांगत शीतल भय, मिति मोह की ताप निशिवासर सुख निधि, लाहा अन्न प्रगत आप्प || आवत गारी एक है, उलटन होए अनेक | कह कबीर नहीं उलटिए, वही एक की एक उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय | एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय || अवगुण कहू शराब का, आपा अहमक होय मानुष से पशुआ भय, दाम गाँठ से खोये || कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय | अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए || कबीरा कलह अरु कल्पना, सैट संगती से जाय | दुःख बासे भगा फिरे, सुख में रही समाय || काह भरोसा देह का, बिनस जात छान मारही | सांस सांस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाही || कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे हॉट न हार साधू बचन जल रूप है, बरसे अमृत धार || #bhakti #bhajan #kabirdohawali #kabir #motivation #doha #hardevbani #song