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ओम शांति। "आत्माएं और परमात्मा अलग रहे बहुकाल सुंदर मेला कर दिया जब सतगुरु मिले दलाल"। "यह है कल्याणकारी आत्माओं और परमात्मा का कुंभमेला"। (20/02/1965) गीत- छोड़ भी दे आकाश सिंघासन.. "शिवबाबा कहते- बच्चे, गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहो"। "बस, मूल बात है- पवित्र रहकर के, मैं जो तुम्हारा बाप हूं, आया हूं.. फिर से पवित्र हेवन स्थापित करने"। "प्यूरिटी" थी ना भारत में? अभी "इंप्यूरिटी", "रावण राज्य"। "अभी रावण राज्य खलास होते हैं"। "आधाकल्प है रावण राज्य, आधाकल्प है रामराज्य"। "जब रावण आते हैं, तो देखो- पीछे दुःख शुरू होते हैं, कलाएं कमती होती जाती हैं"। "अभी इस समय में तुम ईश्वरीय गोद में हो"। "यह ईश्वर फैमिली है, जैसे एक कुटुंब"। बाबा, अभी इस समय तो यह बात नहीं हो सकती है ना? नहीं। बाबा.. फिर "बाबा" क्या अर्थ कहते हो, अच्छा "बाबा" तो हो गया "शिवबाबा", फिर प्रजापिता "ब्रह्माबाबा", और लौकिक भी "बाबा" होते हैं। "बाबा" ने समझाया है ना? इस समय में तुमको तीन बाप हैं, "तुमको"!! दूसरे को नहीं कोई को। दूसरे तो कोई जानते नहीं हैं!! तुमको तीन.. "एक लौकिक, एक पारलौकिक निराकार, एक फिर प्रजापिता ब्रह्मा"। ये हो गए 3 बाबा, बस। फिर और कोई तो गायन है नहीं। "ऐसे और तो हैं, किसको भी कह दो बापू.., ये देखो- ये म्युनिसिपालिटी का ये है.. भाई- ये फादर, जो मेयर होते हैं ना? उनको भी "फादर"। ऐसे तो फादर बहुत होते हैं। कोई भी बुड्ढे को कहेंगे पिताजी, जहा, ऐसे कह देंगे। नहीं। यह रियलिटी में सब बाप बैठकर के समझाते हैं। बाप जो सबको, मनुष्य मात्र को, यह ब्रह्मा मनुष्य है ना? तो बाप जो इसमें (ब्रह्मा) प्रवेश किया है.. रूप बदल के किया है, मनुष्य के तन में आया हुआ है। वह बैठकर के समझाते हैं बच्चों को.. तुम, मेरे बच्चे, कहते भी, सुनाते भी, बात भी आत्माओं से करते है। इस "फादर" को कहा जाता है "रूहानी सर्जन, रूहों को इंजेक्शन देने वाला"। वह कहते हैं- "आत्मा निर्लेप है"। अरे, "आत्मा निर्लेप" कैसे हो सकती हैं? "कहा जाता है की संस्कारों अनुसार जन्म मिलते हैं", और पीछे फिर "आत्मा निर्लेप" कैसे रही? तो देखो ये भी ठीक नहीं। ये भी बेकायदे समझा देते हैं। जब वह बाप को भूल जाते हैं, भूलाते हैं, बेमुख कर देते हैं। तभी "बाबा" कहते हैं, हे मेरे लाडले बच्चों, अभी देखो तुम जानते हो कि देखो तुमको परम-पिता, परम-शिक्षक.. देखो "पतित पावन, परमपिता".. अभी जानते हो ना? "परमपिता को भक्ति मार्ग में सभी याद करते हैं"। सब, सब भगत, साधु.. "साधु" क्या करते हैं"? "साधना" करते हैं। "साधु" क्या करते हैं? "मंडलेश्वर" क्या करते हैं? वो जाते हैं "कुंभ के मेले में और नदियों के ऊपर स्नान करने, पाप धोने"। सब "पतित" है ना? फिर वह (पतित) गुरु तो नहीं हो सकते हैं ना? क्योंकि "खुद ही पतित हैं, जाकर के स्नान करते हैं"। "सभी को ले जाते हैं मेले में, कुंभ के मेले में"। अभी "कुंभ" के लिए बाप ने समझाया था ना? कि वह थोड़ी कुंभ का मेला है? वह "सागर-नदियों" से जो पानी निकलता है। नहीं-नहीं। "कुंभ का मेला" कौन है? "आत्माएं और परमात्मा अलग रहे बहुकाल सुंदर मेला कर दिया जब सतगुरु मिले दलाल"। "तो यह है कल्याणकारी आत्माओं और परमात्मा का (कुंभ) मेला"। इसको कहा जाता है "कुंभ या कॉन्फ्लुएंस"। और वह देखो- क्या करते हैं? कितने लाखों जाकर के डूब के मरते हैं, क्या करते हैं? बड़ी दु:खी होते हैं। यहां देखो- तुम कैसे बैठे हुए हो मौज से? इस पढ़ाई में कोई दरकार है तुम्हारे वेद की शास्त्र की ग्रंथ की? वहां देखो- पुस्तकें इतनी है? वहां वेद ग्रंथ के लिए कितनी पुस्तक हैं? बात बता नहीं सकते। यहां देखो- कुछ भी नहीं। "जो अनपढ़ हैं फिर जो पढ़ा है, फिर गाया जाता है- जो पढ़ा सब भूलो"। बाकि "जो तुम कभी पढ़ा ही नहीं न? वो सुनो बाप से"। हियर.. जो भी सुनते आते हो। "हियर नो ईविल, सी नो ईविल, टॉक नो ईविल"। भला क्या करें फिर? "मैं जो तुमको समझाऊं- वो समझो" फिर बाकी सब तुमको जो भी सुनाते हैं ना? सब भूलों। क्योंकि ये "पतित पावन" की बात है ना बच्चे? वह जो भी कुछ सुनाते है ना? बस, कुछ काम के नहीं है। वो वेदों की कांफ्रेंस, अभी देखो कांफ्रेंस हो रही है", "अभी देखो- बहुत करते हैं कांफ्रेंस"। "ट्रां ट्रां ट्रां" कोई फल ही नहीं निकलता है। बाप बैठ कर के समझाते हैं बच्चे- तुम सब मिलकर के कोशिश करो की "पीस" स्थापन हो। परंतु यह तो बाप के ऊपर है ना? "सभी बच्चों को मुक्ति-जीवनमुक्ति देना, सभी को"। यह तो "वर्ल्ड" का क्वेश्चन है ना? "वर्ल्ड में पीस" चाहिए ना? तो "वर्ल्ड के फादर" का काम है? या तुम लोग का काम है? "जो इस समय में पतित हो, फलाना हो.. ड्रामा अनुसार"। ड्रामा है ना बच्चे? "ड्रामा" को कहा जाता है "प्रीऑरडेंड वर्ल्ड ड्रामा" व जैसे गीता के कायदे व कथन अनुसार। अभी "गीता का भगवान कौन"? सो ही बिचारे नहीं जानते हैं। जो "धर्म" होता है, वो जानते हैं भाई, हमारा धर्म किसने स्थापन किया? हमारा धर्म शास्त्र क्या है? अभी भारत को वो ही पता नहीं की हमारा धर्म संस्थापक कौन है? वंडर है!! जो ऐसा कि बाप ने स्थापन किया और "राजयोग"। बस, गीता में उसका (कृष्ण) नाम डाल दिया। समझे ना? जब एक "गीता" शास्त्र खंडन हो गया, तो बाकी सभी खंडन हो गया। तो देखो, "भागवत, महाभारत".. अभी "महाभारत" क्या है? युद्ध फलाना और युद्ध के मैदान में घोड़े की गाड़ी और "अर्जुन" को बिठा दिया वहां और "कृष्ण" को बैठा दिया "रथी"। अरे, रथ को रथी सो तो बाप आएगा ना? ये रथ इसको "अश्व" भी कहते हैं। इसमें बाप आएगा सवार होंगा? या भगवान बैठकर के गाड़ी में? पलटने लगी पड़ी हैं। जैसे आजकल पलटने दिखलाते हैं ना? अभी बिठा कर के और ये अर्जुन को भगवान ने। अरे भाई "अर्जुन" एक को "भगवान" ने क्या "राजयोग" सिखलाया? बहुत होंगे ना? ढेर होंगे, राजाई स्थापन होती है ना? बस, गाडी में बिठाए दिया, हांथी-घोड़े की गाडी में, "जैसे पहले वायसराए और ये सब.. (20/02/1965)