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जय जिनेन्द्र। हमारी श्रृंखला “जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा” में आपका स्वागत है। इस श्रृंखला के छठे भाग में हम उसी समझ को और आगे बढ़ाते हैं जो अब तक हमारे साथ चल रही है — “राग क्या है?” हम सभी के भीतर दिन-भर अनुभव आते रहते हैं। देखना, सुनना, महसूस करना — यह सब लगातार घटता रहता है। पिछले भागों में हमने यह समझने का प्रयास किया था कि मन में विचार कैसे प्रकट होते हैं और इच्छा किस प्रकार जन्म लेती है। अब जब विचार और इच्छा की प्रक्रिया कुछ हद तक स्पष्ट हो जाती है, तो मन में एक और प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है — जिस अनुभव या इच्छा की ओर मन बार-बार खिंचता है, उसी खिंचाव को जैन दर्शन क्या कहता है? यहीं से राग की चर्चा शुरू होती है। हम अक्सर राग को सिर्फ “अच्छा लगना” या “पसंद” समझ लेते हैं। लेकिन जैन दर्शन में राग सिर्फ भावना नहीं, बल्कि मन की एक विशिष्ट अवस्था है। इस भाग में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि — राग क्या है, वह किस प्रकार मन में टिकता है, और राग क्यों बंधन की दिशा में पहला ठोस कदम बन जाता है। हम यह भी देखेंगे कि राग वस्तुओं के कारण नहीं, बल्कि मन की मान्यता के कारण कैसे स्थिर होता है। वस्तु वही रहती है, पर मन का झुकाव अनुभव को बदल देता है। यह चर्चा किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं है, बल्कि अपने भीतर चल रही राग की प्रक्रिया को शांत भाव से देखने का प्रयास है — ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जो “अच्छा लग रहा है”, वही आगे चलकर बंधन का कारण कैसे बनता है। ⏱️ Chapters 00:00 Intro [02:24] राग का अर्थ: [03:13] आत्मा का स्वभाव नहीं: [05:40] पानी का उदाहरण: जैसे गर्म होना पानी का स्वभाव नहीं (बल्कि आग का संयोग है), वैसे ही राग आत्मा का स्वभाव नहीं, बल्कि कर्म/अज्ञान का संयोग है। [08:58] निश्चय vs व्यवहार: [10:31] सुखाभास (सुख का भ्रम): [13:05] राग एक दोष क्यों: [16:56] राग और इच्छा: [19:57] कषाय का ईंधन: [22:31] गलत मान्यता: [25:36] चुंबक का उदाहरण: राग आत्मा में वह चुंबकीय शक्ति पैदा करता है जो कर्मों को अपनी ओर खींचती है (आश्रव); यही बंधन का दरवाजा है। [28:36] समाधान (साक्षी भाव): राग को न दबाना है, न सही ठहराना है; उसे बस 'जानना' है कि एक भाव उठा है, उससे चिपकना नहीं है। हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं, और जो भी समझ साझा कर रहे हैं, वह अध्ययन और मनन पर आधारित है। उद्देश्य केवल इतना है कि जैन दर्शन की गहराई आज की भाषा में सहज रूप से समझी जा सके। 📚 शोध व स्रोत (Research & References) इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी केवल जैन शास्त्रों और आचार्य–ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी बाहरी दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है। 👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ: • तत्त्वार्थसूत्र — आचार्य उमास्वामी • समयसार — आचार्य कुंदकुंद यह चर्चा इन्हीं दो ग्रंथों में प्रतिपादित तत्त्वों और सीमाओं के भीतर रहकर की गई है। राग की प्रक्रिया को समझने के बाद अब एक और प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है — यदि राग मन को किसी विषय की ओर खींचता है, तो फिर जब वही विषय अनुकूल न रहे, तो मन में क्या घटता है? यहीं से द्वेष की भूमिका स्पष्ट होने लगती है। भाग 7 — “द्वेष क्या है” में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि राग के ठीक विपरीत द्वेष कैसे जन्म लेता है और वह मन की अवस्था को किस दिशा में ले जाता है। इसी क्रम में अगले भाग में ज़रूर जुड़िए। 🎧 Podcast Series Info श्रृंखला / Podcast: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra भाग: 6 (Ep85) 🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts 🔹 Research & Script: Jain Shastras based study 🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain) 🔸 Editor: Rushabh Jain ✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team. यह वीडियो हमारी स्वयं की अध्ययन-प्रक्रिया पर आधारित है। हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं और जैन दर्शन को सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं। 📅 नया भाग क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा। इसलिए जुड़े रहिए इस आंतरिक यात्रा के अगले चरण के साथ। #JainDarshan #ManSochAntarikYatra #Raag #JainPhilosophy #JinvaniShorts #AdhyayanYatra जय जिनेन्द्र।