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जय जिनेन्द्र। हमारी श्रृंखला “जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा” में आपका स्वागत है। इस श्रृंखला के आठवें भाग में हम उस समझ को और आगे बढ़ाते हैं जो अब तक हमारे साथ धीरे-धीरे खुलती चली आई है “आसक्ति क्या है?” हम सभी के भीतर दिन-भर अनुभव आते रहते हैं। देखना, सुनना, महसूस करना यह सब लगातार घटता रहता है। पिछले भागों में हमने यह समझने का प्रयास किया था कि राग क्या है, और फिर द्वेष क्या है और कैसे अनुकूलता और प्रतिकूलता मन की दिशा को बदल देती हैं। अब जब राग और द्वेष दोनों की प्रक्रिया कुछ हद तक स्पष्ट होने लगती है, तो मन में एक और प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरता है यदि मन कभी किसी अनुभव की ओर खींचा चला जाता है, और कभी उसी से दूर हटने लगता है, तो फिर वह कौन-सी अवस्था है जिसमें मन उसी विषय से जुड़ा ही रहता है? यहीं से आसक्ति की चर्चा आरंभ होती है। हम अक्सर आसक्ति को सिर्फ किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति से लगाव मान लेते हैं। लेकिन जैन दर्शन में आसक्ति केवल बाहरी जुड़ाव नहीं, बल्कि मन की एक सूक्ष्म आंतरिक अवस्था है जिसमें चेतना बार-बार उसी दिशा में लौटती रहती है। इस भाग में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आसक्ति क्या है, वह राग से कैसे जुड़ी हुई है, और द्वेष से अलग होते हुए भी उसी प्रक्रिया का अगला चरण कैसे बनती है। हम यह भी देखेंगे कि आसक्ति न तो आत्मा का स्वभाव है, न ही उसे सीधे कर्म कहा जा सकता है, और न ही आसक्ति को आदत या अहंकार समझ लेना सही दृष्टि है। यह चर्चा किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं है, बल्कि अपने भीतर चल रही आसक्ति की प्रक्रिया को शांत भाव से देखने का एक प्रयास है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जो “पकड़” या “जुड़ाव” भीतर बन रहा है, वही बंधन की दिशा कैसे तैयार करता है। ⏱️ Chapters 00:00 Intro [02:38] राग और आसक्ति में अंतर: [04:24] आत्मा का स्वभाव नहीं: [05:43] निर्णायक कारण: आसक्ति राग की तीव्रता से नहीं, बल्कि उसके दोहराव (Repetition) और स्वीकार (Acceptance) से बनती है। बार-बार चलने से पगडंडी बन जाती है। [08:15] वस्तु में आसक्ति नहीं: [10:40] मन की व्यापक प्रवृत्ति: [12:34] दोहरी ताकत: [16:13] स्थिरता का भ्रम: [19:11] 'मेरा' का भाव: अनुभव 'अच्छा है' से 'मेरे लिए अच्छा है' और अंत में 'मेरा सुख है' बन जाता है। इसी अपनेपन से अधूरापन और निर्भरता जन्म लेती है। [21:18] दुख से आसक्ति: [23:32] कर्म बंध का कारण: [26:43] आदत और अहंकार से भेद: हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं, और जो भी समझ साझा कर रहे हैं, वह अध्ययन और मनन पर आधारित है। उद्देश्य केवल इतना है कि जैन दर्शन की गहराई आज की भाषा में सहज रूप से समझी जा सके। 📚 शोध व स्रोत (Research & References) इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी केवल जैन शास्त्रों और आचार्य-ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी बाहरी दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है। 👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ: • तत्त्वार्थसूत्र — आचार्य उमास्वामी • समयसार — आचार्य कुंदकुंद • नियमसार — आचार्य कुंदकुंद यह चर्चा इन्हीं ग्रंथों में प्रतिपादित तत्त्वों और सीमाओं के भीतर रहकर की गई है। आसक्ति की प्रक्रिया को समझने के बाद अब एक और प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है यदि आसक्ति इतनी गहरी हो जाती है, तो फिर वह समय के साथ आदत में कैसे बदल जाती है? यहीं से आगे की यात्रा अगले भाग की ओर बढ़ती है। भाग 9 — “आदत क्यों नहीं छूटती” में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आसक्ति कैसे मन और चेतना को स्वचालित-सा बना देती है। इसी क्रम में अगले भाग में ज़रूर जुड़िए। 🎧 Podcast Series Info श्रृंखला / Podcast: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra भाग: 8 (Ep88) 🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts 🔹 Research & Script: Jain Shastras based study 🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain) 🔸 Editor: Rushabh Jain ✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team. यह वीडियो हमारी स्वयं की अध्ययन-प्रक्रिया पर आधारित है। हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं और जैन दर्शन को सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं। 📅 नया भाग क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा। इसलिए जुड़े रहिए इस आंतरिक यात्रा के अगले चरण के साथ। #JainDarshan #ManSochAntarikYatra #Aasakti #JainPhilosophy #JinvaniShorts #AdhyayanYatra जय जिनेन्द्र।