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शिक्षापत्र ९_श्लोक १८-२४ 10 дней назад

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शिक्षापत्र ९_श्लोक १८-२४
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शिक्षापत्र ९_श्लोक १८-२४

विस्तृत हिंदी सारांश १८वीं कारिका (विरहे युगपत्र्व...): वक्ता (Presenter) समझाते हैं कि १८वीं कारिका में श्री हरिराय जी वर्णन कर रहे हैं कि विरह में 'एक कालावत' (एक ही समय में) प्रभु अपने भक्तों को अपनी लीला का अनुभव करवाते हैं। भगवान 'साकार आनंद रूप' होकर ब्रजभक्तों के हृदय में विराजमान रहते हैं। शुद्ध विरह: वक्ता बताते हैं कि ऐसे भावात्मक और रसात्मक श्री कृष्ण का जब भक्त 'शुद्ध विरह' करते हैं, तभी प्रभु अपनी निज लीला का अनुभव करवाते हैं। जीव को दिन-रात केवल विप्रयोग की 'आरति' (उत्कंठा) होनी चाहिए और हृदय शुद्ध होना चाहिए, तभी निज लीला का अनुभव होता है। पात्र की योग्यता: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि रस का स्वभाव है कि वह पात्र के बिना नहीं ठहरता। रसात्मक सार श्री कृष्ण हैं और पात्र ब्रजभक्त हैं। भगवान अपनी उत्तम लीलाओं का अनुभव सबको नहीं करवाते, बल्कि कुछ अधिकारी और अति प्रिय भक्तों (जैसे श्री स्वामिनी जी) को ही करवाते हैं। १९वीं कारिका (एवं द्विद्रक्...): वक्ता १९वीं कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि १८ श्लोकों तक जिस स्वरूप का निरूपण किया गया, उसके दर्शन करने की इच्छा अपने हृदय में स्थापित करनी चाहिए। यही इच्छा अन्य वस्तुओं में प्रीति को मिटाती है और इसे ही अपना 'प्रेम भाव' जानना चाहिए। शंका समाधान: वक्ता बताते हैं कि यदि कोई कहे कि मेरे हृदय में तो प्रेम का अभाव है, तो श्री हरिराय जी समझाते हैं कि जब तक अन्य (संसार) के प्रति राग की निवृत्ति नहीं होती, तब तक प्रेम दुर्लभ है। जब अन्य राग की निवृत्ति होती है, तभी हृदय में भगवान का स्वरूप स्थिर होता है। २०वीं कारिका (तत स्याद आरती...): वक्ता २०वीं कारिका का अर्थ बताते हैं कि प्रेम भाव होने के बाद 'गृह कार्य' तथा 'देह कार्य' को बाधक मानने वाली 'आसक्ति' होती है। पुष्टि मार्ग में गृहस्थ को अस्वस्थ करने वाली (बेचैन करने वाली) यही आसक्ति है। बाधक और साधक: वक्ता समझाते हैं कि हमें देह संबंधी और घर संबंधी लौकिक-वैदिक कार्यों की जो आरति (चिंता) रहती है, वह भगवत भाव में बाधक है। पुष्टि मार्ग में प्रभु में आसक्ति होना ही 'परम धर्म' है। जिसकी आसक्ति प्रभु में है, वह गृहस्थ धर्म में स्वस्थ (प्रसन्न) कैसे रह सकता है? आसक्ति का लक्षण: वक्ता महाप्रभु जी के 'भक्तिवर्धिनी' ग्रंथ का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि जिस व्यक्ति को भगवान में आसक्ति दृढ़ हो जाती है, उसे भगवान के अतिरिक्त सब कुछ बाधा रूप लगने लगता है। यदि घर-परिवार के कार्य हमें बाधा रूप नहीं लगते और हम उनमें स्वस्थ रहते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमारा चित्त भगवान में पूरी तरह नहीं लगा है। प्रश्नोत्तरी (शुद्ध विरह): प्रश्न: 'शुद्ध विरह' का क्या अर्थ है? उत्तर: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि शुद्ध विरह का अर्थ है 'अतिशय विरह' जिसमें अन्य कोई भी भाव मिश्रित न हो। विप्रयोग के अतिरिक्त मन में और कोई विचार या कामना न हो, यहाँ तक कि 'प्रभु मिलें' ऐसा भी कोई भाव बीच में न आए, केवल विप्रयोग की ही स्थिति बनी रहे। यह पूर्ण निसाधनता की अवस्था है। प्रश्नोत्तरी (नित्य श्रृंगार): प्रश्न: नित्य श्रृंगार में तीन रंग (लाल, हरा, सफेद) का क्या भाव है? उत्तर: वक्ता बताते हैं कि मणि और रत्न किसी न किसी भाव से भावित होते हैं, लेकिन नित्य श्रृंगार में इन रंगों के आने के पीछे कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। २१वीं कारिका (पर परितापोदय...): वक्ता २१वीं कारिका की व्याख्या करते हैं कि आसक्ति से सर्व प्रपंच (संसार) को भुला देने वाले 'परिताप' का उदय होता है। जिसमें प्रपंच की स्फूर्ति (याद) का नाश हो जाए, उसे ही 'व्यसन' कहते हैं। व्यसन का स्वरूप: वक्ता समझाते हैं कि जब भगवान में प्रेम और आसक्ति हो जाती है, तब भगवान दया करके विप्रयोग दान करते हैं। विप्रयोग तब हुआ जानना चाहिए जब प्रभु संबंध के बिना देह संबंधी सभी कार्य विस्मृत हो जाएं। इसके बाद 'व्यसन' होता है, जिसमें प्रभु के बिना रहा नहीं जाता और एक क्षण भी युग समान लगता है। व्यसन में केवल भगवान में तन्मयता होती है। २२वीं कारिका (एवं विधस्तु...): वक्ता २२वीं कारिका का अर्थ बताते हैं कि प्रेम, आसक्ति और व्यसन - यह तीन प्रकार का भाव 'निसाधन' कहा गया है। भगवत सेवा करने वालों को लोक में ऐसे भाव की प्राप्ति 'दुर्लभ' है। भाव की दुर्लभता: वक्ता कहते हैं कि यह भाव हमारे चाहने मात्र से या हमारे साधनों से सिद्ध नहीं होता। जो निरंतर श्रीकृष्ण की सेवा करता है, उसे बहुत लंबे समय बाद भगवत कृपा से ऐसी निसाधनता सिद्ध होती है। २३वीं कारिका (चक्र करुण...): वक्ता २३वीं कारिका की व्याख्या करते हैं कि यह भाव विधिपूर्वक तब सिद्ध होता है जब श्रीकृष्ण के 'भावात्मक मुखारविंद रूप' श्री आचार्य जी महाप्रभु जी की कृपा होती है। आचार्य जी का आश्रय: वक्ता समझाते हैं कि महाप्रभु जी स्वयं भगवत विप्रयोग के मूर्तिमान स्वरूप हैं। जब उनकी कृपा होती है, तब हमें इस भाव की प्राप्ति की प्रक्रिया का ज्ञान होता है। इसलिए यह भाव महाप्रभु जी की कृपा और आश्रय से ही प्राप्त होता है। प्रश्नोत्तरी (व्यसन और प्रपंच): प्रश्नोत्तरी (प्रेम, आसक्ति, व्यसन): प्रश्न: प्रेम, आसक्ति और व्यसन में क्या अंतर बताया गया है? उत्तर: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि 'अन्य राग निवृत्ति' प्रेम का लक्षण है। संसार का 'बाधक प्रतीत होना' आसक्ति का लक्षण है। और जब संसार की 'स्मृति ही न रहे' (प्रपंच विस्मृति), तब वह व्यसन है। यह 'भक्तिवर्धिनी' के मॉडल के अनुरूप ही है। प्रश्नोत्तरी (कुंभनदास जी का प्रसंग): २४वीं कारिका (प्रमेय बलतो...): वक्ता २४वीं कारिका की व्याख्या करते हैं कि इस भाव में 'प्रमेय बल' (भगवान के बल) के बिना और कोई साधन काम नहीं आता। इसलिए सब कुछ छोड़कर अपने श्री आचार्य जी के चरणारविंद का आश्रय करना ही विशेष कर्तव्य है।

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