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[00:00:12] - आठवें शिक्षा पत्र का पूर्व प्रसंग: आठवें शिक्षा पत्र में अब तक हमने देखा कि श्रीहरिराय जी ने शरणागति का निरूपण किया, अन्याश्रय को बाधक बताया और भगवदियों के संग को साधक बताया। 10वें श्लोक का स्मरण: श्रीहरिराय जी स्वयं अपने लिए आज्ञा कर रहे हैं कि वह अपने आप को उत्तम भगवदियों के संग से युक्त नहीं मान रहे हैं। यदि संग मिल जाए पर मन सत्संग में न लगे, तो समझना चाहिए कि संभवतः हम पुष्टि जीव नहीं हैं। 11वीं कारिका: शब्दार्थ - "मैं कितनो लिखूं जो मेरे पुस्तक ऊपर प्राणनाथ श्री ठाकुर जी मेरे मस्तक ऊपर प्राणनाथ श्री ठाकुर जी विराजत हैं तो चित्त के विक्षेपते हृदय में महा चिंता को समुद्र रहत है।" टीका: जीव की क्रिया देख के मन में चिंता बहुत होत है। चिंता का समुद्र हृदय में भरा है। कागद में कहां ताईं लिखो। महाप्रभु जी 'नवरत्न' में 'क्रियमान चिंता' और 'जायमान चिंता' के दो प्रकार बता रहे हैं। कुछ हम अपनी लौकिक अहंता ममता के वश उत्पन्न करते हैं और कुछ सांसारिक वासनाएं अपने आप मन में उठती हैं। उन्हें हरिराय जी ने समुद्रवत बताया है (अपार और अनंत चिंताएं)। गोपेश्वर जी का दूसरा अर्थ: चिंता करते-करते हमारे प्राण सिर तक आ गए हैं। भगवान हमारे प्राण प्रेष्ठ प्राण पति हैं, प्राण की रक्षा करने ছলिए भगवान ही हमारे दुखों को शांत करते हैं। विप्रयोग का अनुभव करते-करते हृदय में तन्मयता आती है। निसाधनता हो तो प्रभु के स्वरूप का अनुभव होता है। [00:05:00] - प्रश्नोत्तरी (10th श्लोक): प्रश्न - "परावृत्ति ही पुनर्भवेत" का क्या अर्थ है? समाधान: जिन सांसारिक चिंताओं में लगा हुआ है, वो चित्त वहां से लौट के (परावृत्ति करके) भगवान में पुनः कब लगेगा (पुनर्भवेत), ये कौन कह सकता है। नवम शिक्षा पत्र का प्रारंभ: अब नवम शिक्षा पत्र में प्रेम, आसक्ति और व्यसन के स्वरूप का पृथक निरूपण करत है। सर्वथा निसाधन होकर भगवत शरणागति का भाव आता है, तब हम भगवान के स्वरूप के अनुभव के योग्य बनते हैं। प्रथम कारिका: अर्थ - "मयूर पिच्छते बांधे नीलकुंतल के आवरण युक्त मुखवारे अपने पति श्री कृष्ण अपने स्वरूप को दर्शन कब देंगे।" टीका: श्री कृष्ण हमारे पति तिन को दर्शन कब होएगो। श्री हरिराई जी ने 'मेरे पति' याते कहे जो ब्रज भक्तन के भाव भावित है। ब्रह्म संबंध को स्मरण करी श्री ठाकुर जी हमारे पति हैं। [00:10:00] - प्रथम कारिका (जारी): मोर पंखों के गुच्छ को भगवान ने मुकुट के रूप में अपने श्री मस्तक पर धारण किया है। वो प्रभु स्वामिनी जी को प्रसन्न करने के लिए धारण करते हैं। नील मुखारविंद के ऊपर श्याम रंग के केश दिखाई दे रहे हैं। द्वितीय कारिका: "भृकुटी रूप धनुष में स्थान है शर बाण जिनने और कस्तूरी के चित्रकरी के चित्रित तथा कमल दलते बड़े विशाल दो नेत्र हैं जिनके..." (18 श्लोक ताई स्वरूप वर्णन है)। टीका: भ्रकुटी धनुष की ताई नाई तहां रसू कस्तूरी को तिलक तथा कपोलन में कमल पत्र और धनुष बाण ले हमारे मन को कब मारेंगे। कमल के पत्रवत बड़े अति विशाल दो नेत्र करी दर्शन दे हमारे ताप कब हरेंगे। अन्य अंगों का वर्णन: मोतिन के आभरण को आलंबी है सुंदर नासिका जिनकी। सुधा रस सहित है अधर जिनके। तीन रेखा युक्त कंठ में विशेष शोभित जो कंठावरण ताक के शोभित है। कंठ में तीन रेखा है ता करी सात्विक राजस तामस तीन प्रकार के भक्तन की स्थिति है, अथवा त्रिलोक मोहित। [00:15:00] - प्रश्नोत्तरी: ठाकुर जी के स्वरूप (नील कलर, सांख्य योग रूपी कुंडल, अनंतता का प्रतीक) और शास्त्रों में पूर्ण वर्णन के विषय में प्रश्न। समाधान: हरिराय जी का 'सहस्राक्ष भावना' के नाम से एक ग्रंथ है। उसमें हरिराय जी ने भागवत जी के वचनों को उद्धृत करते हुए इन सब विषयों का निरूपण किया है। लीलाओं की भी भावनाएं हैं, अलंकारों की भी है। प्रत्येक युग में प्रभु जिन वर्णों के रंगों के साथ प्रकट होते हैं और जिस स्वरूप को ठाकुर जी धारण करते हैं, वो सब शास्त्र से हमें वर्णन प्राप्त होता है। [00:20:00] - प्रश्नोत्तरी (जारी): शिल्प शास्त्र और तंत्र शास्त्र विष्णु के विग्रह निर्माण की या अन्य देवी-देवताओं के विग्रह निर्माण की (अलंकरण आदि) वर्णन करता है। स्वरूप में सभी के अपने-अपने भाव जुड़ जाते हैं। जैसे मथुराधीश, द्वारकाधीश चतुर्भुज हैं, पर हम माखन चोरी के लिए दो श्रीहस्त ऊपर किए, ऐसा ब्रजराजकुमार वाला भाव उसमें जोड़ देते हैं। आगे का श्लोक वर्णन: "प्रफुल्लित है दो गल जिनके, चबुक भूषण कर के युक्त है और सुवर्ण के सूक्ष्म मणिका युक्त वनमाला करके विराजित है।" टीका: दो गल स्थल प्रफुल्लित है सो युगल गीत में वर्णन है। पक्के बेर जैसो श्वेत है मुखारविंद। चबुक भूषण है सो श्री स्वामिनी जी अधर सुधा को अनुभव करें। मधुराष्टक की टीका में इसका वर्णन है। सोने के छोटे मणिका की माला कंठ विराजित है। [00:25:00] - पांचवी कारिका: " रत्न करी गुहित नवरत्न युक्त बड़ी माला जाको वैजयंती माला कहत है सो समस्त भक्तन के भाव से विराजित है। सेवा की रीत: ये सब श्रृंगार आदि धराने का प्रकार स्वरूप की भावना के अनुरूप, लीला की भावना के अनुरूप और नित्य उत्सव, ऋतु के अनुरूप होता है। टिपारा के श्रृंगार मल्ल युद्ध और रात के लिए होते हैं। खेल के दिनों में ऊंचे श्रृंगार किए जाते हैं ताकि होली के दिनों में ठाकुर जी को श्रम ना हो। वागनखा केवल जन्माष्टमी से राधाष्टमी के 15 दिनों तक ठाकुर जी को नजर ना लगे उस भावना से सभी श्रृंगार के ऊपर अंत में धराया जाता है। प्रश्नोत्तरी: वागनखा के भाव पर प्रश्न। समाधान: किशोर लीला और बाल लीला दोनों में अनुरूप भावनाएं की जाती हैं। स्वामिनी जी जो हैं वह ठाकुर जी को किसी की नजर ना लग जाए उस भाव से धराते हैं, और बाल लीला के क्रम में यशोदा जी धरा रहे हैं ऐसा भाव किया जाता है।