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कृष्ण की चेतावनी - रश्मिरथी - रामधारी सिंह दिनकर (हिंदी अनुवाद - Hindi Translation) वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। पांडवों ने कई वर्षों तक वनवास में भटकते हुए अनेक कठिनाइयों और बाधाओं को सहन किया। धूप, वर्षा और कष्ट झेलकर पांडव और अधिक मजबूत व परिपक्व बन गए। भाग्य हमेशा विपरीत नहीं रहता, अब भविष्य में परिवर्तन आने वाला है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। शांति और मित्रता का मार्ग दिखाने तथा सबको सही रास्ते पर लाने के लिए, दुर्योधन को समझाकर भयानक युद्ध और विनाश रोकने के उद्देश्य से, श्रीकृष्ण पांडवों का संदेश लेकर हस्तिनापुर पहुँचे। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! कृष्ण ने कहा—यदि न्याय करना है तो आधा राज्य दो, और यदि यह भी कठिन हो तो केवल पाँच गाँव दे दो, बाकी सारी भूमि अपने पास रखो। पांडव इतने में संतुष्ट रहेंगे और अपने ही लोगों पर शस्त्र नहीं उठाएँगे। दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। दुर्योधन इतना भी देने को तैयार नहीं हुआ और समाज का आशीर्वाद खो बैठा। उल्टा वह श्रीकृष्ण को ही बाँधने का प्रयास करने लगा, जो असंभव था। जब व्यक्ति का विनाश निकट आता है, तो उसकी बुद्धि पहले नष्ट हो जाती है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले— ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।’ श्रीकृष्ण ने क्रोधित होकर गर्जना की और विराट रूप धारण किया। उनके विराट रूप से पूरी सृष्टि काँप उठी और भगवान क्रोध में बोले। कृष्ण व्यंग्यपूर्वक दुर्योधन को चुनौती देते हैं कि मुझे बाँध कर दिखाओ। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। आकाश और वायु—सब कुछ श्रीकृष्ण में समाया हुआ है। समस्त ध्वनियाँ और पूरा संसार उन्हीं में विलीन हैं। जीवन देने और विनाश करने—दोनों शक्तियाँ कृष्ण में हैं। उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर। पूर्व दिशा उनका मस्तक है और पृथ्वी उनका विशाल शरीर है। उनकी भुजाएँ संसार को घेरे हैं और पर्वत उनके चरण हैं। सभी ग्रह-नक्षत्र श्रीकृष्ण के भीतर समाए हुए हैं। दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर। यदि देखने की शक्ति हो तो पूरा ब्रह्मांड कृष्ण में देखा जा सकता है। स्थावर-जंगम, नश्वर-अनश्वर सभी प्राणी उनमें समाहित हैं। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र। शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश, जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। असंख्य सूर्य, चंद्रमा, नदियाँ और समुद्र उनमें स्थित हैं। अनगिनत देवता और शक्तियाँ भी कृष्ण में समाई हैं। यदि साहस हो तो इन सबको भी बाँध कर दिखाओ—यह चुनौती है। भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख, यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण, मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान, इसमें कहाँ तू है। पृथ्वी, पाताल और भूत-भविष्य सब कृष्ण में दिखाई देते हैं। सृष्टि की रचना और आने वाला महाभारत युद्ध भी वे दिखाते हैं। युद्ध में धरती लाशों से भर जाएगी—उसमें दुर्योधन का अस्तित्व नगण्य होगा। हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा। दुर्योधन ने शुभ सलाह और मित्रता का महत्व नहीं समझा। अब विनती नहीं होगी—या तो विजय मिलेगी या मृत्यु। थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’! सभा में सन्नाटा और भय छा गया, सब स्तब्ध रह गए। केवल धृतराष्ट्र और विदुर भयभीत नहीं थे, वे प्रसन्न थे। वे दोनों निर्भय होकर हाथ जोड़कर भगवान की जय-जयकार कर रहे थे। #कृष्ण_की_चेतावनी #KrishnaKiChetavni #श्रीकृष्ण #भगवान_कृष्ण #महाभारत #गीता_ज्ञान #कृष्ण_वाणी #धर्म #अधर्म #धर्म_की_जीत #न्याय #नीति #कर्म #कर्मफल #भारतीय_साहित्य #हिंदी_कविता #हिंदी_साहित्य #काव्य #कविता #हिंदी_अनुवाद #प्रेरणादायक #प्रेरक_कविता #आध्यात्म #आध्यात्मिक_ज्ञान #सनातन_धर्म #संस्कृति #भारतीय_संस्कृति #विचार #जीवन_संदेश #सत्य #वीरता #चेतावनी #KrishnaQuotes #HindiPoetry#SpiritualPoetry #MotivationalHindi