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सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। विपत्ति आने पर कायर लोग डर जाते हैं, लेकिन वीर लोग कभी विचलित नहीं होते। वे धैर्य नहीं खोते, बल्कि कठिनाइयों को अपनाकर काँटों भरे रास्तों में भी अपना मार्ग बना लेते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। सच्चे वीर कभी शिकायत नहीं करते और संकट से भागते नहीं। जो भी कठिनाई सामने आती है, उसे सहते हुए निरंतर परिश्रम करते रहते हैं और स्वयं आगे बढ़कर विपत्तियों का सामना करते हैं। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। दुनिया में ऐसा कोई संकट नहीं जो दृढ़ निश्चयी वीर के मार्ग को रोक सके। जब मनुष्य पूरे बल से प्रयास करता है, तो बड़े-से-बड़े पर्वत भी झुक जाते हैं और कठोर पत्थर तक पानी जैसे नरम बन जाते हैं। गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो। बत्ती जो नहीं जलाता है रोशनी नहीं वह पाता है। मनुष्य के भीतर अनेक महान गुण छिपे होते हैं, जैसे मेंहदी में रंग और दीपक की बाती में प्रकाश। जो व्यक्ति स्वयं प्रयास नहीं करता, उसे जीवन में सफलता और प्रकाश नहीं मिलता। पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड, झरती रस की धारा अखण्ड, मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का सिंगार। जब फूल पिरोये जाते हैं, हम उनको गले लगाते हैं। कठिनाइयों से गुजरने पर ही श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं। गन्ना पिसने पर रस देता है, मेंहदी चोट सहकर श्रृंगार बनती है और फूल तोड़े जाने पर ही माला बनकर गले में सजते हैं। वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ? अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ? जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया। दुनिया में वही महान बना जिसने कभी आराम नहीं किया। जिसने विपत्तियों के बीच रहकर मेहनत की, वही भूमि का विजेता, यशस्वी और नए विचारों का प्रवर्तक बना। जब विघ्न सामने आते हैं, सोते से हमें जगाते हैं, मन को मरोड़ते हैं पल-पल, तन को झँझोरते हैं पल-पल। सत्पथ की ओर लगाकर ही, जाते हैं हमें जगाकर ही। विपत्तियाँ हमें सोने नहीं देतीं, बल्कि जगाकर सही मार्ग की ओर ले जाती हैं। वे मन और शरीर को झकझोरकर हमें जागरूक और सत्पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। वाटिका और वन एक नहीं, आराम और रण एक नहीं। वर्षा, अंधड़, आतप अखंड, पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड। वन में प्रसून तो खिलते हैं, बागों में शाल न मिलते हैं। सुख और संघर्ष अलग-अलग होते हैं। वर्षा, आँधी और धूप जैसे कष्ट ही पुरुषार्थ को मजबूत बनाते हैं। जंगल में फूल तो खिलते हैं, लेकिन मजबूत इमारती लकड़ी बागों में नहीं मिलती। कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर, छाया देता केवल अम्बर, विपदाएँ दूध पिलाती हैं, लोरी आँधियाँ सुनाती हैं। जो लाक्षा-गृह में जलते हैं, वे ही सूरमा निकलते हैं। जो लोग कठिन परिस्थितियों में रहते हैं, वही सच्चे वीर बनते हैं। जिनकी शय्या कंकड़ होती है और छाया केवल आकाश देता है, वही संघर्ष से तपकर सूरमा बनते हैं। बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा! जीवन का रस छन जाने दे, तन को पत्थर बन जाने दे। तू स्वयं तेज भयकारी है, क्या कर सकती चिनगारी है? कवि युवक को प्रेरित करता है कि वह विपत्तियों से ऊपर उठे। कठिनाइयों को सहकर स्वयं को मजबूत बनाए, क्योंकि जब मनुष्य स्वयं तेजस्वी होता है, तो छोटी-सी चिनगारी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। #विपत्ति_जब_आती_है #रामधारी_सिंह_दिनकर #दिनकर_कविता #हिंदी_कविता #प्रेरणादायक_कविता #वीरता #साहस #धैर्य #संघर्ष #संघर्ष_से_सफलता #कठिनाइयाँ #आत्मबल #आत्मविश्वास #जीवन_संघर्ष #कर्मठता #परिश्रम #हौसला #प्रेरणा #सकारात्मक_सोच #हिंदी_साहित्य #काव्य_प्रेम #देशज_कविता #वीर_पुरुष #अडिग_मन #संघर्षशील_जीवन