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यह संभाषण भगवान ने गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर दिया था। इसे प्रशांति निलयम विश्व विध्यालय के छात्रों ने अनुवादित कर प्रेमपूर्वक प्रस्तुत किया है। अवतार वाणी - एपिसोड १ | भगवान बाबा का दिव्य संदेश I Sri Sathya Sai Baba Divine Discourse in Hindi प्रेमस्वरूपो, ज्ञान, विज्ञान, सुज्ञान एवं प्रज्ञान प्राप्त कर चुके व्यक्तियों से भी श्रेष्ठ एक सदाचारी पुत्र होता है। भगवान गणेश सदबुद्धि के प्रतीक हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास एक गुरु होता है, किन्तु विनायक के कोई गुरु है। वे नायकों के नायक हैं, इसीलिए वे विनायक के नाम से जाने जाते है। भगवान गणेश के पास हाथी का सिर है। हाथी सदबुद्धि, निष्ठा एवं विवेक का प्रतिक होता है। हाथी आगे बढ़ने से पहले अपने विवेक का उपयोग करता है। उसी प्रकार भगवान गणेश अपने विवेक से क्षणिक एवं शाश्वत में अंतर पहचान कर ही आगे बढते हैं। ग ण प् ती, अपने नाम के चारों अक्षरों में निहित ज्ञान की श्रेष्ठता को प्रदर्शित करते हैं। हम कोई भी पूजा करें पर भगवान गणेश की पूजा करना न भूलें। विद्यार्थीयों का मुख्य कर्त्तव्य है कि वे भगवान विनायक को अपना आराध्य मानें। विनायक अपने सद्गुणों एवं सद्वृत्तियों के कारण अनुपम एवं अद्वितीय हैं। जब हम विनायक को अपना आदर्श मानते हुए उचित ज्ञान एवं बुद्धि अर्जित करेंगे तभी हम सफल होंगे। भगवन गणेश का उदर बहुत बड़ा है और उसमे ज्ञान की विशिष्ट शक्ति निहित है। हमे ऐसे महान गुणों वाले भगवान विनायक की उपासना करनी चाहिए। विनायक हमारे माता, पिता, मित्र, सम्बन्धी तथा हमारे सब कुछ है। सभी वैदिक उपदेश, शाश्त्र पुराण और सारे उपनिषद भगवान विनायक के दिए हुए उपहार है। प्रेमस्वरूपो, विनायक में क्रोध का अंश मात्र भी नहीं है। वे प्रेम की साक्षात मूर्ति हैं। हमे हमेशा भगवान गणेश के चेहरे पर मुस्कान दिखती है। वे निर्गुण, निरंजन, सनातन, अनंत, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं निर्मल स्वरुप हैं। एक बार माता पार्वती ने विनायक को अपने पास बुलाया। उन्होंने भगवान गणेश को एक फल दिया। जब विनायक और कार्तिकेय दोनों मौजूद थे, माता पार्वती ने कहा कि यह उपहार उसे मिलेगा जो सफलता पूर्वक सारे ब्रम्हाण्ड की परिक्रमा कर लौटेगा। कार्तिकेय वहां से तुरंत अपने रथ पर सवार होकर चल पड़े। वे पूरे विश्व की परिक्रमा करना चाहते थे। किन्तु भगवान गणेश वहीं बैठे रहे। भगवान शिव ने पूछा, "तुम अपनी यात्रा प्रारंभ क्यों नहीं कर रहे हो?" भगवान गणेश ने मुस्कुरा कर कहा, "पिताजी, मुझे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। मेरे लिए सब कुछ यहीं है।" विनायक ने अपने माता-पिता की परिक्रमा की और स्वयं को विजेता घोषित किया। उसी दौरान भगवान कर्तिकेय वापस आ गए। पूरे विश्व की परिक्रमा करने के कारण वे बहुत थक गए थे और बोले, "पिताजी मैं विजेता हूँ।" वास्तव मे पूरे विश्व के लिये माता-पिता ही सबसे महान हैं। अपने माता-पिता की परिक्रमा करना ही पर्याप्त है। अतः भगवान को प्रसन्न करने के लिए तुम्हें अपने माता-पिता को प्रसन्न करना चाहिये और तुममें उनके प्रति भरपूर प्रेम होना चाहिए। माता-पिता से बड़ा भगवान कोई भी नहीं है। उनको प्रसन्न करने के लिये उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे माता-पिता हमसे नाराज हैं। अगले ही क्षण वे बदल जाते हैं। हमें ऐसा कभी नहीं सोचना चाहिए कि वे हमसे नाराज हैं। सिनेमा जाने के लिए बच्चे अपने माता-पिता से पैसे मांगते हैं। पैसे न मिलने पर तुम सोचते हो कि माँ क्रोधित हैं। इतनी तुच्छ इच्छा के कारण तुम सोचते हो कि माँ नाराज हैं। इन छोटी छोटी इच्छाओं के कारण तुम्हें कभी भी यह नही सोचना चाहिए कि वे क्रोधित हैं। अपने भरपूर प्रेम के कारण, माँ अपनी संतान के लिए प्राण भी त्यागने के लिए तत्पर रहती हैं। जब ऐसी मातायें हैं तो यह सोचना कितनी बडी भूल है कि माँ तुमसे नाराज हैं। लेकिन आज कुछ लोग ऐसे हैं कि माँ से नाराज होने के कारण उन्हें कोर्ट में ले जाते हैं। कुपुत्र का होना संभव है लेकिन बुरे माता-पिता का होना संभव नहीं हैं। आज बच्चों को समझना चाहिए कि माता-पिता साक्षात प्रेम की मूरत हैं और उन्हें उनके प्रेम को अनुभव करना चाहिए। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे पास स्वामी के रूप मे भगवान विनायक हैं। किसी भी क्षण उनके अंदर ईष्या, अहंकार अथवा किसी प्रकार का आडम्बर नहीं हैं। अतः जब हम विनायक के गुणों का पालन करेंगे तो हमारे पास सूंड भले न हो पर हमारा विनायक बनना स्पष्ट हैं।