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ईशोपनिषद् के तेरहवें से अठारहवें मंत्र तक साधक को बाह्य कर्म और आंतरिक ज्ञान—दोनों के समन्वय की शिक्षा देते हैं। उपनिषद् कहता है कि केवल कर्म में उलझ जाना या केवल ज्ञान का बौद्धिक अभिमान पाल लेना—दोनों ही साधना को अपूर्ण बना देते हैं। जो विद्या और अविद्या, अर्थात् ज्ञान और कर्म—दोनों को साथ लेकर चलता है, वही मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अमर सत्य को प्राप्त करता है। आगे उपनिषद् सम्भूति और असम्भूति का रहस्य खोलता है। नश्वर जगत को नकारना भी भ्रम है और केवल उसी में उलझ जाना भी अज्ञान है। जो नश्वर में रहते हुए अविनाशी ईश्वर को पहचान लेता है, वही जीवन और मृत्यु—दोनों पर विजय प्राप्त करता है अंतिम मंत्रों में साधक की हृदय-विदारक प्रार्थना प्रकट होती है। वह ईश्वर से कहता है—हे पूषन्! सत्य को ढँकने वाले इस स्वर्णिम आवरण को हटा दो, ताकि मैं तुम्हारे वास्तविक स्वरूप का दर्शन कर सकूँ। यह आवरण अहंकार, देहाभिमान और कर्म-फल की आसक्ति है। साधक अग्नि से प्रार्थना करता है कि उसके कर्मों को स्मरण रखते हुए उसे शुभ मार्ग पर ले चले और अंत समय में उसके भीतर सत्य की स्मृति जाग्रत रहे। देह के नाश के क्षण में वह यह बोध करता है कि यह शरीर भस्म होने योग्य है, पर प्राण और आत्मा अविनाशी हैं। उपनिषद् का निष्कर्ष अत्यंत स्पष्ट और दिव्य है—जब अहंकार का आवरण हट जाता है, तब जीव स्वयं को ईश्वर से भिन्न नहीं पाता। आत्मा ब्रह्म में लीन नहीं होती, बल्कि यह जान लेती है कि वह सदा से ब्रह्म ही थी। यही ईशोपनिषद् के मंत्र 13 से 18 का परम संदेश है—जीवन में समन्वय और अंत में आत्मसाक्षात्कार। हिरण्मय आवरण का हटना और आत्म-ब्रह्म साक्षात्कार