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इंद्र ने नारदजी से कहा, हे मुनि ! मैं भगवान् का विशेष कृपापात्र हूँ।' इस उक्तिको निरस्त कर रहे हैं। कथा ___इन्द्र द्वारा अपने गुरु का अपमान । ब्रह्म हत्या का पाप और निरन्तर पतन का भय ____त्वष्टा rishi के पुत्र विश्वरूप को पुरोहित बनाया। ___ब्रह्म हत्या को चार स्थानों में बाट दिया। ___ त्वष्टा ऋषि द्वारा यज्ञ में त्रुटि। ___ वृत्तासुर से इंद्र का युद्ध ____ इन्द्र का मान सरोवर में कमल की नाल में छिपना। भगवान् श्रीउपेन्द्रकी भी मेरे प्रति विशेषरूपसे उपेक्षा रहती है, क्योंकि उन्होंने सुधर्मा सभा और पारिजात वृक्षको इस स्वर्गसे ले जाकर मर्त्यलोकमें स्थापित कर दिया है।१९।। उन्होंने मेरी पूजाको, जिसे गोपलोग चिरकालसे करते थे, बन्द करवा दिया है और मेरे अत्यधिक प्रिय विशाल खाण्डव वनको भी जलाकर राख करवा दिया है॥२०॥ पूर्व कालमें जब मैंने त्रिलोक ग्रासकारी वृत्रासुरका वध करनेके लिए भगवान्से प्रार्थना की थी, उस समय भी भगवान्ने उस विषयमें उदासीन रहकर मुझको ही इस कार्यके लिए प्रेरित किया।।२१।। उन्होंने मेरी अवज्ञा करके मेरी अमरावतीको श्रीहीन कर दिया तथा सब लोकोंसे ऊपर अपने एक नवीन भवनकी रचना की है॥ २२॥ वे भगवान् मेरे माता-पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा गुरुदेव बृहस्पतिजीके अत्यधिक आग्रहसे बाध्य होकर मेरी पूजा स्वीकार तो करते हैं, परन्तु शीघ्र ही अपने अदृश्य भवनको चले जाते हैं ॥ २३ ॥ #gaudiyavaishnav #harikatha #srilaprabhupada