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🙏🪷हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं🪷🙏 ॥ श्रीहरि: ॥ दिनांक 6.2.26. वि. सं. 2082, 'कालयुक्त' संवत्सर, फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, पंचमी, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 12.10.1996, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— हाड़ा कुटीर, वृन्दावन। ⚜️ 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥' (गीता-2/16) असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है, असत् पहले नहीं था, अन्तमें नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी निरन्तर अभावमें जा रहा है। जितनी उम्र आ गई, उतना तो अभाव हो गया और कितने दिन रहना है, इसका पता नहीं है। और सत् तत्त्वका अभाव विद्यमान नहीं है। आदिमें एक सत्-तत्त्व ही था, अन्तमें दृश्य मात्र नहीं रहेगा तो एक सत्-तत्त्व ही रह जाएगा और बीचमें भी एक सत्-तत्त्व ही विद्यमान है। नाशवान् शरीर-संसारमें जो होना-पन दिख रहा है, यह होना-पन नाशवान् का नहीं होकर सत्-तत्त्वका (चेतनका) ही है। ⚜️ 'है सो सुन्दर है सदा नहीं सो सुन्दर नाहिं। नहीं सो परगट देखिये है सो दीखे नाहिं॥' आजसे सौ बरस पहले यहाँ कुछ भी नहीं था और सौ-हजार वर्ष बादमें यहाँ कुछ भी नहीं रहेगा, तो 'नहीं' का अभाव ही सिद्ध हुआ। हमारी सबकी स्थिति नित्य निरन्तर सदा रहने वाले 'है' तत्त्वमें ही है, 'नहीं' में अपनी स्थिति मानी हुई है। शरीर-संसारका अभाव स्वत: है और परमात्माका भाव स्वत: है। तत्त्व दर्शियोंने इन दोनोंका अनुभव किया है कि तीनों कालमें एक सत्-तत्त्व ही विद्यमान है। जो नित्य निरन्तर है, वह अपना है और जो नित्य निरन्तर बदल रहा है, अभावमें जा रहा है, वह अपना नहीं है। ⚜️ 'जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥' जिसकी सत्यतासे जड़ माया भी सत्यकी तरह दिख रही है। अनन्त ब्रह्माण्ड निरन्तर मिट रहे हैं और परमात्मा निरन्तर टिक रहा है। जो तत्त्व निरन्तर रह रहा है, उसीको राम, कृष्ण, गोविन्द, वासुदेव, माधव, मुकुन्द आदि नामोंसे कहा गया है, उसीकी प्राप्तिमें मनुष्य जन्मकी सार्थकता है। नित्य प्राप्तको प्राप्त करना है और नित्य अप्राप्तसे विमुख होना है। ⚜️ संसारकी सत्ताको लेकर सत्, असत्— दो कहते हैं, संसारकी सत्ता स्वीकार नहीं करें तो एक सत् तत्त्व ही है। जैसे मनुष्य और मनुष्यका स्वभाव दो है, स्वभावमें परिवर्तन होता है, लेकिन उसे अलग करके बता भी नहीं सकते, ऐसे ही एक परमात्मा है और परमात्माकी, परा और अपरा नामसे दो प्रकृतियाँ है। परा प्रकृति परमात्मस्वरूप है, इसमें कभी कोई परिवर्तन होता ही नहीं और अपरा प्रकृतिमें निरन्तर परिवर्तन होता ही रहता है। बदलनेके प्रवाहको ही स्थिति कह देते हैं, प्रकृतिमें केवल बदलना ही बदलना है, प्रकृतिमें स्थिति है ही नहीं; एक सच्चिदानन्द परमात्मा ही है। ⚜️ 'खोया कहे सो बावरेप पाया कहे सो कूर। पाया खोया कुछ नहीं ज्यों का त्यों भरपूर॥' 'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।' कण्ठी गलेमें थी और वहम हो गया कि कण्ठीखो गई, फिर किसीने कपड़ेके नीचेसे कण्ठीको निकाल कर बता दिया। कण्ठीका और गलेका वियोग कभी हुआ ही नहीं, कण्ठी गलेमें ही रही, केवल अप्राप्तिका वहम मिट गया; इस तरह परमात्माकी स्मृति आ गई। 🌷🌷🌷🌷🌷 #कैलाशजीमहाराज #आध्यात्मिकप्रवचन #प्रवचन #swamiramsukhdasji #गीता_भवन_ऋषिकेश #ganga #rishikeshsatsang #कैलाशजीमहाराज#sadhaksanjeevani #sadhakokisanjivani #गीता_भवन_ऋषिकेश #सत्संग #प्रवचन #भक्ति #श्रीमद्भगवद्गीता #हेनाथ #मैंआपकोभूलूनहीं #संतवाणी #आध्यात्मिकप्रवचन #SanatanDharma #RishikeshSatsang #SwamiRamsukhdasji