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भगवान शिव के 'नीलकंठ' बनने की कहानी हिंदू पुराणों की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह घटना 'समुद्र मंथन' के दौरान घटित हुई थी। यहाँ इसकी पूरी कहानी सरल शब्दों में दी गई है: 1. समुद्र मंथन की शुरुआत एक समय की बात है, जब दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवता अपनी शक्ति खो चुके थे। अपनी खोई हुई शक्ति और 'अमृत' (जिससे अमर हुआ जा सके) प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों (दानवों) ने मिलकर समुद्र का मंथन करने का निर्णय लिया। 2. विष (हलाहल) का निकलना मंथन के दौरान समुद्र से बहुत से रत्न और चमत्कारिक चीजें निकलीं, लेकिन अचानक उसमें से 'हलाहल' नामक एक अत्यंत विनाशकारी विष निकला। यह विष इतना घातक था कि इसकी गर्मी और धुएं से पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। देवता, असुर और समस्त प्राणी नष्ट होने लगे। 3. शिव का त्याग जब कोई भी उस विष को रोकने में सक्षम नहीं था, तब सभी भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुँचे। संसार की रक्षा के लिए शिव ने उस विष को खुद पीने का निर्णय लिया। महादेव का संकल्प: शिव ने वह सारा विष अपनी हथेली पर लेकर पी लिया। माता पार्वती का हस्तक्षेप: जैसे ही शिव विष को निगलने लगे, माता पार्वती ने उनके गले को कसकर पकड़ लिया। वह नहीं चाहती थीं कि विष उनके पेट में जाए और उनके भीतर स्थित पूरे ब्रह्मांड को नुकसान पहुँचाए। 4. नीलकंठ नाम की उत्पत्ति पार्वती जी के रोकने के कारण वह विष शिव के गले में ही अटक गया। विष के प्रभाव से शिव का गला नीला पड़ गया। नील + कंठ = नीलकंठ (जिसका गला नीला हो) इस कहानी का गहरा अर्थ यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि एक गहरा जीवन पाठ भी है: धैर्य और संयम: शिव ने विष को न तो बाहर निकाला (जिससे दुनिया जल जाती) और न ही पूरी तरह अंदर लिया (जिससे स्वयं को हानि होती)। उन्होंने उसे गले में रोक लिया, जो यह सिखाता है कि हमें नकारात्मकता को नियंत्रित करना आना चाहिए। परोपकार: संसार के कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहना ही सबसे बड़ी शक्ति है।