У нас вы можете посмотреть бесплатно शास्त्र-वचनों में अटूट विश्वास और भगवानका अविचल निश्चय वचनामृत सारंगपुर 13 की शिक्षाएं или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
🙏🌺 प्रस्तावना स्वामीनारायण संप्रदाय के महत्वपूर्ण ग्रंथों में 'वचनामृत' का स्थान सर्वोपरि है। यह साक्षात् भगवान श्री स्वामीनारायण (श्रीजी महाराज) के मुखारविंद से निकली अमृतवाणी है। सारंगपुर प्रकरण का 13वां वचनामृत एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक प्रश्न का समाधान करता है: "भगवान का निश्चय होने के बाद भी वह क्यों मिट जाता है?" यह लेख इस वचनामृत के सार, शास्त्रों की महत्ता और आध्यात्मिक स्थिरता पर विस्तार से चर्चा करता है। 1. वचनामृत सारंगपुर 13 का ऐतिहासिक संदर्भ संवत् 1877 में भाद्रपद शुक्ला द्वितीया (9 सितंबर, 1820) के दिन श्रीजी महाराज सारंगपुर ग्राम में जीवाखाचर के राजभवन के बरामदे में विराजमान थे। श्वेत वस्त्र धारण किए हुए महाराज के समक्ष मुनि और विभिन्न स्थानों से आए हरिभक्त बैठे थे। इसी दिव्य सभा में मुक्तानंद स्वामी ने वह प्रश्न पूछा जो हर साधक के मन में कभी न कभी उठता है। 2. मुक्तानंद स्वामी का प्रश्न और संदेह का मूल मुक्तानंद स्वामी ने पूछा कि यदि किसी मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाला) को भगवान के स्वरूप का निश्चय हो जाए, लेकिन बाद में वह निश्चय डगमगा जाए या मिट जाए, तो क्या उसे 'यथार्थ निश्चय' कहा जाएगा? इसके उत्तर में स्वयं प्रकाशानंद स्वामी ने तर्क दिया कि यदि आत्मा में निश्चय हुआ हो तो वह नहीं टलता। लेकिन यदि भगवान कोई ऐसा चरित्र (लीला) करें जिसका शास्त्रों में उल्लेख न हो, तो उसे देखकर साधक का निश्चय डगमगा सकता है। 3. श्रीजी महाराज का सिद्धांत: शास्त्रों की अनिवार्यता श्रीजी महाराज ने इस चर्चा को एक नई दिशा दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान का 'अविचल निश्चय' केवल और केवल शास्त्रों के माध्यम से ही संभव है। इसके पीछे उन्होंने निम्नलिखित मुख्य कारण बताए: शास्त्रों में सामर्थ्य का वर्णन: शास्त्रों में भगवान की सामर्थ्य, असमर्थता, कर्तृत्व और अकर्तृत्व—इन सबका वर्णन है। भगवान की ऐसी कोई लीला नहीं है जो शास्त्रों के विपरीत हो। लक्षणों की पहचान: शास्त्रों में ही भगवान और सच्चे संतों के लक्षण बताए गए हैं। बिना शास्त्र के ज्ञान के, व्यक्ति अपनी बुद्धि से भगवान को समझने की कोशिश करता है, जो अंततः भ्रम का कारण बनती है। अविचल निश्चय का आधार: महाराज कहते हैं कि जिसने अपनी 'मनमानी' या केवल बुद्धि से निश्चय किया है, उसका विश्वास टूट सकता है। परंतु जिसने शास्त्रों के वचनों पर विश्वास रखकर निश्चय किया है, उसका विश्वास हिमालय की तरह अडिग रहता है। 4. धर्म और मर्यादा में शास्त्रों की भूमिका लेख के इस भाग में महाराज एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि समाज में जो माता, बहन, और पुत्री संबंधी मर्यादाएं आज भी जीवित हैं, उनका मूल कारण भी शास्त्र ही हैं। भले ही किसी ने सीधे शास्त्र न सुने हों, लेकिन परंपरा के माध्यम से वह ज्ञान उन तक पहुँचा है। अतः, जो व्यक्ति शास्त्रों के वचनों को नकारता है, महाराज उसे 'नास्तिक' और 'मनमानी करने वाला' कहते हैं। उनके अनुसार, शास्त्रों में प्रीति रखने वाला भक्त कभी भी भगवान से विमुख नहीं होता। 5. कल्याण का मार्ग: शास्त्र-वचनों में विश्वास वचनामृत के अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि भगवान चाहे कैसी भी लीला करें, वह शास्त्रों के अनुसार ही होती है। जिसे शास्त्र-वचनों में अटूट विश्वास है, उसका कल्याण निश्चित है। ऐसा भक्त कभी भी धर्मच्युत (धर्म से गिरने वाला) नहीं होता। आध्यात्मिक निष्कर्ष वचनामृत सारंगपुर 13 हमें यह सिखाता है कि भक्ति के पथ पर 'तर्क' से अधिक 'श्रद्धा' और 'शास्त्र' का महत्व है। हमारी निजी बुद्धि सीमित हो सकती है, लेकिन ऋषियों और स्वयं भगवान द्वारा दिए गए शास्त्र त्रिकाल अबाधित सत्य हैं। यदि हम अपने निश्चय को शास्त्रों की नींव पर खड़ा करेंगे, तो संसार की कोई भी परिस्थिति हमें विचलित नहीं कर पाएग #Vachanamrut #Sarangpur13 #Swaminarayan #SpiritualWisdom #HinduScriptures #ShreejiMaharaj #BhaktiYoga #SpiritualGrowth #IndianPhilosophy #Satsang #Dharma #SatsangShibir