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शब्दों से मुक्त होना - India Manifest 04 | Pure Road . [Verse 1] बाहर की बातें, न रूप हैं, न आकार, मुझसे उनका कोई संबंध नहीं, क्योंकि मैं शांत शून्य हूँ। [Verse 2] निराकार और शून्यता, एक-दूसरे को कैसे हानि पहुँचा सकते हैं, दोनों ही अदृश्य, दोनों ही रिक्त, तो मैं झूठे शब्दों से क्यों जुड़ूँ? [Chorus] यह केवल ध्वनि का कंपन है, जो आता है और शून्य में विलीन हो जाता है, ध्वनि मन को छू नहीं सकती, न ही मेरी भावना तय कर सकती है। [Verse 3] मेरा मन भी निराकार है, मैंने उसे कभी पकड़ा नहीं, कभी उसका चेहरा नहीं देखा, तो क्लेश को मैं कैसे मान लूँ? [Chorus] जो मन जन्मता और मिटता है, वह मैं नहीं हो सकता, मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ, इसलिए सभी परिवर्तन जानता हूँ। [Verse 4] भय भ्रम से उत्पन्न होता है, सब कुछ सच मान लेने से, अब जब मन भी असत्य है, तो डरने वाला कौन है? [Bridge] मन न उठे तो मुक्ति है, मुक्ति क्योंकि ‘मैं’ नहीं है, न सच्चा दुःख, न भय, वे केवल क्षणिक छायाएँ हैं। [Chorus] जब मैं स्वयं को जानता हूँ, मैं शून्य स्वभाव में लौटता हूँ, निराकार, शांत आकाश सा, फिर भी सदा जागरूक। [Outro] कोई शब्द मुझे छू नहीं सकता, कोई बात मुझे बाँध नहीं सकती, मैं जानने वाला शून्य हूँ, शांत, स्वतंत्र, मुक्त।