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अहंकार का विघटन – निराकार का प्रत्यक्ष बोध - India Manifest 05 | Pure Road . [Verse 1] मैं यह रूप नहीं हूँ, न शरीर, न आकृति, न कोई नाम, मैं किसी संप्रदाय का नहीं हूँ, न कोई साधना-पद्धति जिससे जुड़ूँ। [Verse 2] मैं न कभी जन्मा, न कभी मरा, तो ठहरने का स्थान कहाँ हो सकता है? संप्रदाय, साधना या संघ, सब केवल सापेक्ष दृष्टि के नाम हैं। [Chorus] मैं यह संघ नहीं हूँ, क्योंकि धर्म कभी दो रूपों में नहीं रहे, संघ और मैं दोनों शून्य हैं, कभी जन्मा नहीं, तो नाश भी नहीं। [Verse 3] मैं प्रत्यक्ष शून्यता हूँ, अनादि-अनंत आकाश हूँ, मेरी साधना कभी सिद्ध नहीं होती, क्योंकि निर्वाण आकाश के समान है। [Chorus] आकाश ही बुद्ध है, निर्वाण भी बुद्ध ही है, बुद्ध बनने का अर्थ है लौट आना, उस सत्य शून्यता में। [Verse 4] संघ मुक्ति के लिए साधना करता है, पर वह भी शून्यता की ओर लौटना है, जब शून्यता का कोई रूप नहीं, तो छोड़ने या लौटने को क्या है? [Bridge] धर्म कभी दो नहीं थे, छोड़ने या पकड़ने को कोई रूप नहीं, शुद्ध या अशुद्ध कहना, सब केवल भ्रमित कथन हैं। [Chorus] मैं स्वभाव से अजन्मा-अमर हूँ, सदा से निराकार हूँ, साधना सत्य को देखना है, न जोड़ना, न घटाना। [Outro] संघ स्वयं शून्य है, न जन्म, न विनाश, मैं वह आकाश हूँ जो जानता है, निर्गुण, निरहंकार, शांत।