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अचल स्थिरता में स्थित - India Manifest 06 | Pure Road . [Verse 1] मैं अचल स्थिरता में स्थित हूँ, जीवन के mọi हलचलों के बीच भी दृढ़ हूँ, अब मैं सच में जानता हूँ, मैं तो प्राचीन काल से ही अचल, अडिग सत्य हूँ। [Verse 2] मैं मूलतः निराकार हूँ, स्वभाव से ही शून्य आकाश से एकरूप, निराकार ही मेरा स्वभाव है, कंपन और हलचल कभी भी मैं नहीं हूँ। [Chorus] यदि संसार मुझसे कहे कि मुझे हिलना चाहिए, तो संसार स्वयं ही भ्रम में है, क्योंकि जब मेरे पास कोई रूप ही नहीं, तो हिलाने के लिए “मैं” कहाँ और क्या हिलाया जाए? [Verse 3] यदि संसार मेरे मन को प्रभावित करता दिखाई दे, तो वह केवल संसार का स्वयं हिलना भर है, मेरा मन वास्तव में नहीं हिल सकता, क्योंकि जब “मैं” ही नहीं, तो मन का रूप कहाँ से होगा जो हिले? [Chorus] मैं और मन दो रूप नहीं हैं, हम एक ही वर्तमान, रिक्त, शून्य-साक्षी स्वरूप हैं, अचल आकाश ही मैं हूँ, अपरिवर्तनशील शून्यता ही मेरा शांत, निर्विकल्प स्वरूप है। [Verse 4] यदि कोई हिलाना चाहे भी, तो हिला नहीं सकता, क्योंकि वास्तव में कोई रूप उत्पन्न ही नहीं होता, संसार को रूप दिखाई देता है, क्योंकि संसार ने अभी तक अपने सत्य स्वरूप को जाना नहीं है। [Bridge] बुद्ध ने मुझे स्वयं को पहचानना सिखाया, स्वयं को जो अजन्मा और अमर है, शांत, निःशब्द, रिक्त, न बढ़ने वाला, न घटने वाला, न बदलने वाला, न झुकने वाला। [Chorus] सारी हलचल केवल स्वप्न और माया है, हिलना है पर वास्तव में न हिलना, कंपन है पर वास्तव में न होना, क्योंकि हिलना–डुलना वास्तव में अप्राप्य है, वह सत्य में कभी घटित ही नहीं होता। [Outro] जब जान लिया कि वह वास्तव में अस्तित्व नहीं रखता — तो वही अचलता है, जब जान लिया कि वह वास्तव में सत्य नहीं — तो वही न हिलना है, मैं शून्य, शांत, निःशब्द आकाश हूँ, दृढ़, स्थिर, वर्तमान, शाश्वत और अडिग।