У нас вы можете посмотреть бесплатно "पाहुडदोहा" मुनि रामसिंह कृत, अपभ्रंशकाव्य शैली, व्या.-पार्ट-71, डॉ वीरसागर जैन, नई दिल्ली -09.02.26 или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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एक्कु सुवेयइ अण्णु ण वेयइ । तासु चरिउ णउ जाणहि देवइँ ।। जो अणुहवइ सो जि परियाणइ । पुच्छंतहँ समित्ति को आणइ ।।166।। अर्थ- जो एक का ही भली प्रकार वेदन करता है, अन्य किसी का वेदन नहीं करता है, उसका चरित्र देवों द्वारा भी नहीं जाना जाता | जो अनुभव करता है, वही जानता है | पूछने वाले का समाधान कौन कर सकता है | जं लिहिउ ण पुच्छिउ कहण जाइ, कहियउ कासु वि णउ चित्ति ठाइ । अह गुरुउवएसें चित्ति ठाइ, तं तेम धरंतह कहिमि ठाइ ।।167।। अर्थ- जो न लिखा जाता है, न पूछा जाता है, न कहा जाता है और यदि कहा जाए तो भी किसी के चित्त में नहीं बैठता है, वह गुरु के उपदेश से चित्त में बैठ जाता है, चाहे कोई कहीं भी स्थित हो | कड्ढइ सरिजलु जलहि-विपिल्लउ । जाणु पवाणु पवणपडिपिल्लिउ ।। बोहु विबोहु तेम संघट्टइ । अवर हि उत्तउ ता णु पयट्टइ ।।168।। अर्थ- नदी का पानी समुद्र के द्वारा विपरीत दिशा में प्रेरित होकर खिंचता है, बड़े-बड़े जहाज भी पवन से प्रेरित होकर चलते हैं, उसीप्रकार जब बोध और विबोध में संघर्ष होता है तो कुछ और ही बात प्रकट होती है | अंबरि विविहु सद्दु जो सुम्मइ । तहिं पइसरहुँ ण वुच्चइ दुम्मइ ।। मणु पंचहिं सिहु अत्थवण जाइ । मूढा परमतत्तु फुडु तिहि जि ठाइ ।।169।। अर्थ- आकाश में जो विविध शब्द सुनाई देता है, वहाँ प्रसार करो | दुर्मति उसे नहीं जानता | जहाँ मन पांचों इन्द्रियों के साथ अस्त हो जाता है, वही परम तत्त्व है, उसी में स्थित होओ, मूढ़ जीव उसे नहीं पहचानंता | अखइ णिरामइ परमगइ, अज्ज वि लउ ण लहंति । भग्गी मणहं ण भंतडी, तिम दिवहडा गणंति ।।170।। अर्थ- अक्षय निरामय परम गति आज भी आसानी से प्राप्त नहीं हो रही है, क्योंकि मन की भ्रान्ति नहीं भागी है और ऐसे ही दिन पास हो रहे हैं |