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नको रे मना द्रव्य ते पुढिलांचे | अति स्वार्थबुद्धी नार पाप सांचे || घडे भोगणे पाप ते कर्म खोटे | न होता मानासारिखे दुःख मोठे || सदा सर्वदा प्रीती रामी धरावी | सुखाची स्वये सांडि जीवी करावी || देहेदुःख ते सुख मानीत जावे | विवेके सदा स्वस्वरूपी भरावे || जनी सर्व सुखी असा कोण आहे | विचारे मना तूचि शोधूनि पाहे || मना त्वांची रे पूर्वसंचीत केले | तयासारिखे भोगणे प्राप्त झाले || मना मानसी दुःख आणू नको रे | मना सर्वथा शोक चिंता नको रे || विविके देहबुद्धि सोडूनी द्यावी | विदेहीपणे मुक्ति भोगीत जावी || मना सांग पां रावणा काय झाले | अकस्मात ते राज्य सर्वे बुडाले || म्हणोनी कुडी वासना सांडि वेगी | बळे लागला काळ हा पाठिलागी || जिवा कर्मयोगे जनीं जन्म झाला | परी शेवटी काळमूखी निमाला || महाथोर ती मृत्युपंथेचि गेले | कितीएक ते जन्मले आणि मेले || मना पाहता सत्य हे मृत्युभुमी | जिता बोलती सर्वही जीव मी मी || चिरंजीव हे सर्वही मानिताती | अकस्मात सांडूनिया सर्व जाती || मरे एक त्याचा दुजा शोक वाहे | अकस्मात तोहि पुढे जात आहे || पुरेना जनीं लोभ रे क्षोभ त्याते | म्हणोनी जनीं मागुता जन्म घेते || मनी मानवा व्यर्थ चिंता वहाते | अकस्मात होणार होऊनी जाते || घडे भोगणे सर्वही कर्मयोगे | मतीमंद ते खेद मानी वियोगे || मना राघवेवीण आशा नको रे | मना मानवाची नको कीर्ति तू रे || जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे | तया वर्णिता सर्वही श्लाघ्यवाणे || मना सर्वथा सत्य सांडू नको रे | मना सर्वथा मिथ्य मांडू नको रे || मना सत्य ते वाचे वदावे | मना मिथ्य ते मिथ्य सोडूनि दयावे || बहू हिंपुटी होईजे मायपोटी | नको रे मना यातना तोचि मोठी || निरोधे पचे कोंडिले गर्भवासी | अधोमूख रे दुःख त्या बाळकासी || मना वासना चूकवी येरझारा | मना कामना सोडि रे द्रव्यदारा || मना यातना थोर हे गर्भवासी | मना सज्जना भेटवी राघवासी || मना सज्जना हीत माझे करावे | रघूनायका दृढ चित्ती धरावे || महाराज तो स्वामि वायुसुताचा | जना उध्दरी नाथ लोकत्रयाचा || न बोले मना राघवेवीण काही | जनी वाउगे बोलता सूख नाही || घडीने घडी काळ आयुष्य नेतो | देहांती तुला कोण सोडू पहातो || रघूनायकावीण वाया शिणावे | जनासारिखे व्यर्थ का वोसणावे || सदा सर्वदा नाम वाचे वसो दे | अहंता मनी पापिणी ते नसो दे ||