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मना वीट मानू नको बोलण्याचा | पुढे मागुता राम जोडेल कैचा || सुखाची घडी लोटता सुख आहे | पुढे सर्व जाईल काही न राहे || देहेरक्षणाकारणे यत्न केला | परी शेवटी काळ घेऊन गेला || करी रे मना भक्ति या राघवाची | पुढे अंतरी सोडि चिंता भवाची || भवाचा भये काय भीतोस लंडी | धरी रे मना धीर धाकासी सांडी || रघूनायकासारिखा स्वमि शीरी | नुपेक्षी कदा कोपल्या दंडधारी || दिनानाथ हा राम कोदंडधारी | पुढे देखता काळ पोटी थरारी || मना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || पदी राघवाचे सदा ब्रीद गाजे | बळे भक्तिरीपुशिरी कांबि वाजे || पुरी वाहीली सर्व जेणें विमानी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे | असा सर्व भूमंडळी कोण आहे || जयाची लिला वर्णिती लोक तीन्ही | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || महासंकटी सोडिले देव जेणे | प्रतापे बळे आगळा सर्वगुणे || जयाते स्मरे शैलजा शूलपाणी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || अहल्या शिळा राघवे मुक्त केली | पदी लागता दिव्य होऊन गेली || जया वर्णिता शीणली वेदवाणी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || वसे मेरूमांदार हे सृष्टिलीला | शशी सूर्य तारांगणे मेघमाला || चिरंजीव केले जनीं दास दोन्ही | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || उपेक्षी कदा रामरूपी असेना | जिवा मानवा निश्चयो तो वसेना || शिरी भार वाहे न बोले पुराणी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || असे हो जया अंतरी भाव जैसा | वसे हो तया अंतरी देव तैसा || अनन्यास रक्षीतसे चापपाणी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || सदा सर्वदा सन्नीध आहे | कृपाळूपणे अल्प धारिष्ट पाहे || सुखानंद आनंद कैवल्यादानी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || सदा चक्र वाकासि मार्तंड जैसा | उडि घालितो संकटी स्वमि तैसा || हरीभक्तिचा घाव गाजे निशाणी | नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी || मना प्रार्थना तूजला एक आहे | रघूनाथ थक्कीत होऊनि पाहे || अवज्ञा कदा हो यदर्थी न कीजे | मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे || जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे | जयाचेनि योगे समाधान बाणे || तयालागि हे सर्व चांचल्य दीजे | मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे || मना पाविजे सर्वहि सूख जेथे | अती आदरे ठेविजे लक्ष तेथे || विविके कुडी कल्पना पालटीजे | मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||