У нас вы можете посмотреть бесплатно मुफ़्ती ए मालवा को दी हज़ारों नम आंखों ने अंतिम विदाई или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
कोहराम एक्सप्रेस न्यूज़ 1 जुलाई की सुबह इंदौर और मालवा के मुसलमानों के लिए बहुत बड़ी गम की खबर लेकर आई। जिससे मालूम हुआ कि मुफ्ती-ए-मालवा हबीब यार खां साहब 72 साल की उम्र में इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो गए। आपकी तबीयत पिछले कई दिनों से खराब चल रही थी, इस बीच आपको वेंटीलेटर पर भी रखा गया। बीच में हालत में सुधार हुआ, लेकिन पीर की सुबह उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। आपके इंतेकाल की खबर जैसे ही आपके चाहने वालों को मिली चारों तरफ गम की लहर दौड़ गई। आपके घर के बाहर सैकड़ों की तादाद में लोग पहुंचना शुरू हो गए। काजी-ए-शहर डॉ. इशरत अली और मुफ्ती-ए-मालवा के बेटे अहमद यार खां ने शिफा हास्पिटल (हज हाउस) में आपके जनाजे की नमाज और सुपुर्दे खाक जामा मस्जिद के सहन में ही करने का ऐलान किया। इसके बाद आपका जनाजा आपके घर से पहले हज हाऊस पहुंचा, जहां नमाज-ए-जनाजा हुई, इसके बाद जनाजा जामा मस्जिद लाया गया और यहीं पर आपको सुपुर्दे खाक किया गया। मय्यत में हजारों की तादाद में लोग शामिल थे। हज हाउस से बड़वाली चौकी तक रास्ते में कोई जगह ऐसी नहीं थी, जो सरों से खाली हो। आपके बारे में हबीब यार खां साहब ने अपनी शुरुआती तालीम बरेली शरीफ मजहर-ए-इस्लाम से शुरू की, इसके बाद आप नागपुर जामिआ अमजदिया मदरसा पहुंचे, जहां पर मुफ्ती का कोर्स पूरा किया। नागपुर में आपके उस्ताद महाराष्ट्र के मुफ्ती मौलाना गुलाम मोहम्मद रहे, इसके बाद मुफ्ती मुजीब अशरफ साहब नागपुर ने आपकी तालीम मुकम्मल करवाई। इलाहाबाद में भी आपने मदरसा जामिआ हबीबीया में तालीम ली। इसके बाद आप इंदौर आ गए और मोईनिया मस्जिद पिंजारा बाखल में इमामत शुरू की। इसके बाद रंगरेजा मस्जिद कड़ावघाट रहे। इसी दौरान 1984 में मुफ्ती रि़जावुनर्रहमान सहसवानी साहब का विसाल हो गया और उस वक्त के उलेमाओं ने आपको मुफ्ती-ए-मालवा बना दिया और आप जामा मस्जिद आ गए। यहां तकरीबन पिछले 40 सालों से आप इमामत भी कर रहे थे और साथ ही दीनी मसाइलों के हल के लिए दारुल इफ्ताह में अपनी दीनी खिदमात देते रहे। आप हाफी़ज-ए-कुरआन भी थे और 55 साल आपने रम़जान में तरावीह पढ़ाई। आपने हुजूर मुफ्ती-ए-आ़जम से बेअत की। 1973 में दारुल उलूम नूरी की शुरुआत मुफ्ती मोहम्मद अय्युब मजहरी, मुफ्ती-ए-आ़जम हिन्द के निगरानी में हुई। कुछ वक्त के बाद नूरी बिल्डिंग को खरीदा गया और अभी कुछ साल पहले खजराना में भी दारुम उलूम नूरी शुरू हो चुका है। मुफ्ती-ए-मालवा हबीब यार खां साहब अपने पीछे अपने तीन बेटे और तीन बेटियों से भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। आपके एक बेटे एहमद यार खां साहब जामिया अजहरी मिस्र से पढ़ाई करके लौटे हैं, तो वहीं दूसरे बेटे मोहम्मद सुबहान अमेरिका में इंजीनियर हैं। तीसरा बेटा मोहम्मद फैज़ान है। आपके बाद कौन? एक सवाल जो कुछ साल पहले ही शुरू हो गया था कि हबीब यार खां साहब के बाद इस शहर की कायादत कौन करेगा। अफवाहें भी बाजार में गर्म हो गई थीं कि आपके बाद यह जिम्मेदारी आपके बेटे अहमद यार खां संभालेंगे, लेकिन आपने इन आफवाहों पर विराम लगाते हुए एक दस्तारबंदी के कार्यक्रम में ऐलान कर दिया था कि मेरे बाद मुफ्ती-ए-मालवा की जिम्मेदारी मौलाना नुरुल हक साहब संभालेंगे। हालांकि उस वक्त कुछ लोगों की राय हाफी़जो कारी मुफ्ती एमए डॉक्टर अब्दुल अलीम ऱजवी को बनाए जाने की थी। इस पर आपने कहा था कि नुरुल हक साहब के बाद यह जिम्मेदारी अब्दुल अलीम ऱजवी ही संभालेंगे। आपके बारे में अवाम की राय आपकी मय्यत में आए चंद लोगों से आपके बारे में बात की गई तो तकरीबन सभी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि आपके जाने से मालवा में सुन्नीयत को बड़ा नुकसान हुआ है। जो इखलाश आपके पास था, वो शहर के दूसरे आलिमों के पास नहीं है। हमेशा हंसमुख रहते थे। किसी पर नाराज होना तो शायद आपको आता ही नहीं था, हां शरीअत के मामले में जरूर जुमा के खत्बे वक्त आपको जलाल आ जाता था। कई किताबें लिखीं मुफ्ती-ए-मालवा हबीब यार खां साहब ने कई किताबें लिखीं हैं, जिनमें शरीयत की बारिक से बारिक जानकारियां दी गर्इं हैं। अभी ह़़जरत एक किताब फतावा-ए-हबीबीया पर काम कर रहे थे, जो छपना बाकी रह गई। मोईनुद्दीन रि़जवी का कहना है कि किताब तकरीबन पूरी हो चुकी थी, सिर्फ़ छपाई का काम बाकी रह गया था।