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जय जिनेन्द्र। हमारी श्रृंखला “जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा” में आपका स्वागत है। 📌 स्पष्टता हेतु सूचना: इस एपिसोड में प्रयुक्त ग्रंथ “गोम्मटसार (जीवकाण्ड)” आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती जी द्वारा रचित है। कुंदकुंद परम्परा के संदर्भ के कारण नाम-सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हो गया था, जिसे यहाँ स्पष्ट किया जा रहा है। आज इस श्रृंखला के बारहवें भाग में हम एक ऐसे विषय पर ठहरते हैं जो अक्सर महसूस तो किया जाता है, लेकिन बहुत कम समझा जाता है — “भय कैसे बनता है?” हम अपने दैनिक जीवन में कई बार यह अनुभव करते हैं कि हम डर रहे हैं, असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, या भीतर कोई अनजानी बेचैनी चल रही है। अक्सर हम इसका कारण बाहर खोजते हैं। लेकिन जैन दर्शन यहीं पर रुककर एक सूक्ष्म प्रश्न उठाता है। जैन दर्शन के अनुसार भय किसी बाहरी वस्तु या परिस्थिति से सीधे उत्पन्न नहीं होता। यह वह अवस्था है जहाँ देखने की दिशा धीरे-धीरे संकुचित होने लगती है, और मन संभावनाओं को सुरक्षा और खतरे के तराजू में तोलने लगता है। इस भाग में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि भय आत्मा का स्वभाव नहीं है, फिर भी वह इतना वास्तविक क्यों प्रतीत होता है। और कैसे सोच के बंद होने के बाद यही भय धीरे-धीरे हमारी समझ, निर्णय और व्यवहार को दिशा देने लगता है। यह चर्चा किसी डर को बढ़ाने के लिए नहीं है, न ही भय से बाहर निकलने की कोई विधि बताने के लिए। बल्कि अपने भीतर चल रही उस प्रक्रिया को शांत भाव से देखने और समझने का एक प्रयास है जहाँ भय बिना शोर किए अंदर आकार लेता है। इस एपिसोड में हम समझेंगे — Chapters — Intro 00:00 हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं, और जो भी समझ साझा कर रहे हैं, वह अध्ययन और मनन पर आधारित है। उद्देश्य केवल इतना है कि जैन दर्शन की गहराई आज की भाषा में सहज रूप से समझी जा सके। 📚 शोध व स्रोत (Research & References): इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी केवल जैन शास्त्रों और आचार्य–ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी बाहरी दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है। 👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ: इस भाग की जानकारी मुख्य रूप से इन जैन ग्रंथों से ली गई है: तत्त्वार्थसूत्र — आचार्य उमास्वामी समयसार — आचार्य कुंदकुंद नियमसार — आचार्य कुंदकुंद गोम्मटसार (जीवकाण्ड) — आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती आवश्यक स्थानों पर शास्त्रीय सीमा की पुष्टि और सिद्धांत की स्पष्टता के लिए तत्त्वार्थसूत्र की पारंपरिक टीका संदर्भ रूप में देखी गई है। भय को समझना इस श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण चरण है। लेकिन यह यात्रा का अंत नहीं है। जब भय भीतर स्थिर होने लगता है, तो मन सुरक्षा की तलाश में नियंत्रण की ओर बढ़ने लगता है। इसी से अगला स्वाभाविक प्रश्न उठता है — भाग 13 — “असुरक्षा और नियंत्रण की चाह” इसी विषय पर हम अगले भाग में क्रमबद्ध रूप से चर्चा करेंगे। ज़रूर सुनिए। 🎧 Podcast Series Info: श्रृंखला / Podcast: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra भाग: 12 (Ep92) 🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts 🔹 Research & Script: Jain Shastras based study 🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain) 🔸 Editor: Rushabh Jain ✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team. यह वीडियो हमारी स्वयं की अध्ययन-प्रक्रिया पर आधारित है। सभी शोध, लेखन और सामग्री का संकलन हमने अपने प्रयास से किया है। हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं और जैन दर्शन को सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं। 📅 नया भाग क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा। इसलिए जुड़े रहिए इस आंतरिक यात्रा के अगले चरण के साथ। #JainDarshan #ManSochAntarikYatra #BhayKaiseBantaHai #JainPhilosophy #JinvaniShorts #AdhyayanYatra जय जिनेन्द्र।