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हृदय से नाम जप होने लगेगा ! //08-02-26 // Shri Hit Premanan#motivation #parmanandji #motivational समझ गया 😊 आप इसे ज़्यादा साफ़, प्रभावी और वायरल-फ्रेंडली बनाना चाहते हैं। यहाँ कुछ polished caption options हैं — भाव वही, प्रेज़ेंटेशन strong 👇 Option 1 – Minimal & Powerful हृदय से नाम जप होने लगेगा 🙏 // 08-02-26 // Shri Hit Premanand Ji ✨ #motivation #premanandji #bhakti #naamjap #spirituality Option 2 – Emotional + Viral जब मन थम जाएगा… हृदय से नाम जप होने लगेगा ❤️ // 08-02-26 // Shri Hit Premanand Ji #motivation #motivationalvideo #bhakti #premanandji #viral Option 3 – Clean Reels Style ज़ोर से नहीं, एक दिन हृदय से नाम जप होने लगेगा 🙏 // 08-02-26 // Shri Hit Premanand Ji #spiritualmotivation #naamjap #bhajan #viralvideo हृदय से नाम जप होने लगेगा “हृदय से नाम जप होने लगेगा” — यह वाक्य केवल एक प्रेरक पंक्ति नहीं है, बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का सार अपने भीतर समेटे हुए है। इसमें साधना की पराकाष्ठा, भक्ति की परिपक्वता और आत्मा की सहज अवस्था का वर्णन है। जब कोई संत या महापुरुष यह कहते हैं, तो उनका संकेत केवल जप की क्रिया की ओर नहीं होता, बल्कि उस अवस्था की ओर होता है जहाँ साधक और साधना में कोई भेद नहीं रह जाता। सामान्यतः मनुष्य नाम जप को एक क्रियात्मक अभ्यास की तरह करता है। माला हाथ में लेकर, निश्चित संख्या में, निश्चित समय पर नाम का उच्चारण किया जाता है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि प्रारंभ में मन चंचल होता है, इंद्रियाँ बाहर की ओर भागती हैं और अभ्यास के बिना स्थिरता नहीं आती। इसलिए शास्त्रों और संतों ने नियमबद्ध जप को आवश्यक बताया है। लेकिन यह केवल पहला चरण है। जब जप केवल होंठों तक सीमित रहता है, तब वह श्रम तो है, पर रस नहीं। जैसे कोई व्यक्ति भोजन तो करे, पर स्वाद न आए। धीरे-धीरे, जब साधक का जीवन शुद्ध होने लगता है, विचारों में सरलता आती है, अहंकार ढीला पड़ता है और श्रद्धा गहराने लगती है, तब जप का केंद्र होंठों से खिसककर मन में आने लगता है। इस अवस्था में व्यक्ति बोलता कम है, अनुभव अधिक करता है। लेकिन संतों के अनुसार असली जप तब शुरू होता है, जब मन भी पीछे छूट जाता है और हृदय जागृत होता है। हृदय से तात्पर्य केवल शारीरिक हृदय नहीं, बल्कि वह आंतरिक चेतना है जहाँ प्रेम, करुणा, समर्पण और निष्कपट भाव निवास करते हैं। जब नाम वहाँ स्थापित हो जाता है, तब जप “किया” नहीं जाता, बल्कि होने लगता है। इस अवस्था में साधक प्रयास नहीं करता। न माला की आवश्यकता रहती है, न संख्या की चिंता। उठते-बैठते, चलते-फिरते, यहाँ तक कि मौन में भी भीतर नाम की ध्वनि बहती रहती है। जैसे माँ अपने बच्चे को बिना प्रयास याद करती है, जैसे प्रेमी अपने प्रिय को बिना बुलाए महसूस करता है—वैसे ही नाम साधक के अस्तित्व का हिस्सा बन जाता है। पूज्य Shri Hit Premanand Ji जैसे संत इसी अवस्था की ओर संकेत करते हैं। वे बार-बार कहते हैं कि ईश्वर को पाने का मार्ग कठोर तपस्या या बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि सरलता, दीनता और प्रेम से होकर जाता है। जब तक “मैं” बना रहता है, तब तक जप बोझ लगता है। और जब “मैं” गलने लगता है, तब नाम स्वयं हृदय में प्रकट हो जाता है। हृदय से नाम जप होने में सबसे बड़ी बाधा है — अहंकार। जब व्यक्ति यह मानता है कि “मैं जप कर रहा हूँ”, “मैं साधक हूँ”, “मैं आगे बढ़ गया हूँ”, तब वही ‘मैं’ उसे रोक देता है। जैसे ही यह भाव आता है कि “मेरे बिना कुछ नहीं”, उसी क्षण कृपा दूर खड़ी हो जाती है। लेकिन जब व्यक्ति यह मान लेता है कि “मैं कुछ नहीं हूँ, सब उसी की कृपा है”, तब कृपा स्वयं दौड़कर आती है। नाम जप का वास्तविक उद्देश्य भी यही है — अहंकार का क्षय। नाम हमें याद दिलाता है कि हम सीमित हैं और ईश्वर असीम। हम निर्बल हैं और वही बल है। जब यह स्मरण गहरा हो जाता है, तब जप केवल शब्द नहीं रहता, वह आत्मसमर्पण बन जाता है। एक और महत्वपूर्ण बात है — धैर्य। हृदय से नाम जप एक दिन में नहीं होता। इसमें समय लगता है, गिरना पड़ता है, भटकना पड़ता है। कई बार मन उचटता है, कई बार जप सूखा लगता है। लेकिन वही साधक आगे बढ़ता है जो इन अवस्थाओं में भी जप नहीं छोड़ता। संत कहते हैं—नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता। चाहे मन लगे या न लगे, नाम अपना काम करता रहता है। जब नाम हृदय में उतरने लगता है, तब जीवन में कुछ परिवर्तन स्वतः दिखाई देने लगते हैं। क्रोध कम होने लगता है, सहनशीलता बढ़ती है, दूसरों के दोष कम दिखते हैं और अपने दोष स्पष्ट होने लगते हैं। व्यक्ति बाहरी सुखों से अधिक भीतर की शांति को महत्व देने लगता है। यह सब किसी जबरदस्ती का परिणाम नहीं, बल्कि नाम की कृपा का फल होता है। अंततः वह क्षण आता है, जहाँ साधक को यह भी याद नहीं रहता कि वह जप कर रहा है। वहाँ केवल प्रेम होता है, मौन होता है, और एक निरंतर स्मरण होता है। यही वह अवस्था है जिसे संत “हृदय से नाम जप” कहते हैं। यही भक्ति की परिपक्वता है, यही जीवन की सिद्धि है। इसलिए “हृदय से नाम जप होने लगेगा” कोई वादा नहीं, बल्कि एक आश्वासन है। यह उस हर व्यक्ति के लिए है जो ईमानदारी से, धैर्यपूर्वक और श्रद्धा के साथ नाम का आश्रय लेता है। जब समय आएगा, तब प्रयास अपने-आप छूट जाएगा और नाम स्वयं हृदय में विराजमान हो जाएगा। 🙏 नाम करते रहिए… एक दिन हृदय स्वयं नाम बन जाएगा।