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जय जिनेन्द्र। हमारी श्रृंखला “जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा” में आपका स्वागत है। इस श्रृंखला के तीसरे भाग में हम उसी विचार-धारा को और आगे बढ़ाते हैं जो अब तक हमारे साथ चल रही है — “विचार कहाँ से पैदा होते हैं?” हम सभी के भीतर दिन-भर अनुभव आते रहते हैं। देखना, सुनना, महसूस करना — यह सब लगातार घटता रहता है। पिछले भाग में हमने यह देखने का प्रयास किया था कि ये अनुभव सीधे विचार नहीं बन जाते। इन्द्रियाँ केवल आत्मा और बाहरी विषयों के बीच संपर्क स्थापित करती हैं, और उस संपर्क के बाद मन किस दिशा में झुकता है — यहीं से आंतरिक प्रक्रिया शुरू होती है। इसी समझ के साथ अब एक अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है — यदि अनुभव इन्द्रियों से आते हैं और मन उन्हें ग्रहण करता है, तो फिर विचार कहाँ से पैदा होते हैं? हम सभी के भीतर विचार चलते रहते हैं। कुछ विचार क्षणभर में समाप्त हो जाते हैं, जबकि कुछ बार-बार लौटते हैं और मन को घेर लेते हैं। लेकिन क्या विचार आत्मा का स्वभाव हैं? या वे किसी प्रक्रिया का परिणाम हैं? जैन दर्शन इसी बिंदु पर एक सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टि देता है। जैन दर्शन के अनुसार विचार आत्मा का स्वभाव नहीं हैं। आत्मा का स्वभाव जानना और देखना है। विचार मन, इन्द्रिय-संपर्क और स्मृति के संयोग से प्रकट होने वाली एक अवस्था हैं। यह चर्चा किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं है, बल्कि अपने भीतर चल रही विचार-प्रक्रिया को शांत भाव से देखने का प्रयास है — ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कुछ विचार हमारे नियंत्रण से बाहर क्यों लगते हैं और कुछ अपने-आप क्यों समाप्त हो जाते हैं। ⏱️ Chapters 00:00 Intro [02:27] विचार क्या है ? [04:40] स्वभाव vs अवस्था [06:35] मन और विचार में अंतर [08:48] बिना इंद्रियों के विचार [10:45] विचार से पहले आत्मा [13:54] विचार बनने के 3 चरण [15:44] आत्मा केवल ज्ञाता [16:57] विचार बार-बार क्यों आते हैं। [19:29] आकस्मिकता का खंडन [22:02] विचार और राग-द्वेष [25:34] दर्पण का उदाहरण हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं, और जो भी समझ साझा कर रहे हैं, वह अध्ययन और मनन पर आधारित है। उद्देश्य केवल इतना है कि जैन दर्शन की गहराई आज की भाषा में सहज रूप से समझी जा सके। 📚 शोध व स्रोत (Research & References) इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी केवल जैन शास्त्रों और आचार्य–ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी बाहरी दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है। 👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ: • तत्त्वार्थसूत्र — आचार्य उमास्वामी • समयसार — आचार्य कुंदकुंद यह चर्चा इन्हीं दो ग्रंथों में प्रतिपादित तत्त्वों और सीमाओं के भीतर रहकर की गई है। विचार की उत्पत्ति को समझने के बाद अब एक और प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है — यदि विचार मन में प्रकट होते हैं और विचार के साथ राग या विराग जुड़ता है, तो फिर इच्छा कहाँ से जन्म लेती है? यही प्रश्न हमें अगले भाग की ओर ले जाता है। भाग 4 — “इच्छा क्या है” विचार से इच्छा तक की प्रक्रिया और इच्छा का स्वाभाविक स्वरूप। इसी विषय पर हम अगले भाग में शांत और स्पष्ट रूप से चर्चा करेंगे। ज़रूर सुनिए। 🎧 Podcast Series Info श्रृंखला / Podcast: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra भाग: 3 (Ep83) 🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts 🔹 Research & Script: Jain Shastras based study 🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain) 🔸 Editor: Rushabh Jain ✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team. यह वीडियो हमारी स्वयं की अध्ययन-प्रक्रिया पर आधारित है। हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं और जैन दर्शन को सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं। 📅 नया भाग क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा। इसलिए जुड़े रहिए इस आंतरिक यात्रा के अगले चरण के साथ। #JainDarshan #ManSochAntarikYatra #Vichaar #JainPhilosophy #JinvaniShorts #AdhyayanYatra जय जिनेन्द्र।