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इस वीडियो में प्रस्तुत है “राजसी सूर्य स्तोत्रम्” — जिसमें ध्यान, विनियोग, करन्यास, अङ्गन्यास तथा फलश्रुति सहित पूर्ण पाठ दिया गया है। यह स्तोत्र राजसी तेज, आरोग्य, आयु, यश, राज्यलाभ तथा आत्मबल की वृद्धि हेतु विशेष फलदायी माना गया है। रविवार प्रातःकाल सूर्य अर्घ्य के साथ इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन में तेज, आत्मविश्वास और सफलता का प्रकाश प्रस्फुटित होता है। 🌅 विशेष लाभ: आरोग्य एवं दीर्घायु पद-प्रतिष्ठा एवं राजसी प्रभाव आत्मबल एवं तेजवृद्धि शत्रुनाश एवं बाधा निवारण नियमित ११ या २१ बार पाठ करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। 🔖 #राजसीसूर्यस्तोत्र #सूर्यउपासना #रविवारपूजा #लेखरंजन #सूर्यनारायण #ध्यानविनियोगन्यास #आरोग्यप्राप्ति #राजयोग #संस्कृतस्तोत्र #सनातनधर्म __ अथ श्री लेखरंजन-कृतं राजसी सूर्य स्तोत्रम् ॥ ध्यानम् ॥ जटाजूटं किरीटाढ्यं रक्ताम्बरधरं विभुम्। सप्ताश्वरथमारूढं पद्महस्तं दिवाकरम्॥ अरुणप्रभमुद्भासं लोकचक्षुं तमोनुदम्। राजसीं तेजसां मूर्तिं ध्यायेद् भास्करमव्ययम्॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्री-राजसी-सूर्य-स्तोत्रस्य ऋषिः — लेखरंजनः। छन्दः — अनुष्टुप्। देवता — श्री राजसी सूर्यनारायणः। बीजम् — ह्रां। शक्तिः — ह्रीं। कीलकम् — ह्रूं। सर्वराज्य-यश-आरोग्य-आयुर्वृद्ध्यर्थे जपे विनियोगः॥ करन्यासः ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः। ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः। ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥ अङ्गन्यासः ह्रां हृदयाय नमः। ह्रीं शिरसे स्वाहा। ह्रूं शिखायै वषट्। ह्रैं कवचाय हुं। ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्रः अस्त्राय फट्॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ १. नमो राजाधिराजाय तेजोराशे नमोऽस्तु ते। भानवे लोकनाथाय सर्वसाक्षिणे नमः॥ २. त्वं प्रभाकर विश्वात्मा प्राणिनां जीवनप्रदः। त्वयि स्थितं जगत्सर्वं त्वमेव परमं पदम्॥ ३. आरोग्यं देहि मे नित्यं आयुः कीर्तिं च शाश्वतीम्। राज्यलक्ष्मीं च मे देहि शत्रुनाशं दिवाकर॥ ४. दारिद्र्य-दुःख-तिमिरं भिन्दि भास्कर भास्वरे। आत्मतेजः प्रकाशय त्वमेव शरणं मम॥ ५. सप्ताश्वरथमारूढ राजसीं मूर्तिमाश्रये। लेखरंजन-वाक्सिद्धिं कुरु सूर्य नमोऽस्तु ते॥ ६. पुत्रपौत्र-समृद्धिं च विद्यां बुद्धिं च देहि मे। धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं भव भास्कर॥ ७. नमस्ते रक्तवर्णाय सहस्रांशो नमोऽस्तु ते। त्वत्पादपद्मसंस्पर्शात् सर्वमङ्गलमस्तु मे॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ यः पठेत् प्रातरुत्थाय श्रद्धया राजसीं स्तुतिम्। तस्य तेजो वर्धते नित्यं राज्यलाभो न संशयः॥ आरोग्यं दीर्घमायुष्यं यशः कीर्तिश्च वर्धते। सूर्यप्रसादात् सिद्धिः स्यात् सर्वकामार्थसिद्धिदा॥ __ राजसी सूर्य स्तोत्र — पाठ विधि (विस्तृत विधान) १️⃣ उपयुक्त दिन एवं समय विशेषतः रविवार को करें। श्रेष्ठ समय: सूर्योदय काल (प्रातः 5:30–7:30 के मध्य)। यदि संभव न हो तो प्रतिदिन प्रातः भी कर सकते हैं। २️⃣ पूर्व तैयारी प्रातः स्नान कर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। आसन: कुशासन या लाल आसन उत्तम। ताम्रपात्र में स्वच्छ जल, लाल पुष्प, अक्षत, रोली रखें। ३️⃣ अर्घ्य प्रदान ताम्रपात्र में जल लेकर उसमें लाल पुष्प व अक्षत डालें। सूर्यदेव को तीन बार अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय मंत्र जपें — “ॐ घृणि: सूर्याय नमः” ४️⃣ न्यास एवं ध्यान पहले करन्यास और अङ्गन्यास करें। तत्पश्चात सूर्यदेव का ध्यान करें — सप्ताश्वरथमारूढ़, रक्तवर्ण, किरीटधारी तेजस्वी रूप का चिंतन करें। ५️⃣ स्तोत्र पाठ संख्या सामान्य लाभ हेतु — १ बार विशेष कार्य सिद्धि हेतु — ११ बार राजसी तेज, पद-प्रतिष्ठा हेतु — २१ बार विशेष अनुष्ठान: लगातार ४० दिन पाठ करें। संकल्प वाक्य: “अहं चत्वारिंशद्दिनपर्यन्तं राजसीसूर्यस्तोत्रपाठं करिष्ये।” ६️⃣ समापन अंत में 108 बार जप करें — “ॐ सूर्याय नमः” आरती करें और सूर्यदेव से आरोग्य, आयु, यश की प्रार्थना करें। ताम्रपात्र का जल तुलसी या किसी पवित्र वृक्ष में अर्पित करें। 🌟 विशेष सावधानियाँ पाठ के समय मन शुद्ध एवं एकाग्र रखें। क्रोध, असत्य एवं अपवित्र आहार से बचें। रविवार को नमक का त्याग करने से फल शीघ्र प्राप्त होता है।